रविवार, 30 जनवरी 2011

सबसे ज्यादा प्लानर डायरी खरीद


शेखर झा
कुछ साल पहले लोगों का डायरी खरीदने के लिए काफी रुझान हुआ करता था मगर विगत कुछ सालों से लोगों का इसके लिए इंटरेस्ट कम हुआ है। कंप्यूटर, लेपटॉप, नोट पेड जैसे डिवाइस के चलते अब लोग डायरी खरीदना कम ही पसंद करते हैं। इसके बावजूद भी वर्तमान समय में लोगों के द्वारा डायरी की खरीदी की जा रही है। शहर की स्टेशनरी दुकानो में लॉ डायरी, डेली डयरी, नोट डायरी, फैंसी डायरी, फ्लावर डायरी, प्लानर डायरी, लॉक डायरी, डिजायनिंग डायरी आदि उपलब्ध हैं।
प्लानर डायरी की खरीदी ज्यादा
गोल बाजार स्थित नूरी स्टेशनरी दुकान के संचालक मोहम्मद साहिल बताते हैं कि लोगों के पास नोटपेड व लेपटॉप होने के बाद भी वो आज भी डायरी खरीदना पसंद करते हैं। आज भी लोग बड़ी व छोटी दोनों तरह की डायरी खरीदना पसंद करते हैं। आज भी लोगों को कुछ लिखना रहता है तो वो डायरी में ही नोट करना ज्यादा उचित समझते हैं। दुकानों में कई तरह की डायरी उपलब्ध हैं। लोग सबसे ज्यादा प्लानर डायरी खरीद रहे हैं। मार्केट में कम रेंज से लेकर हजार रुपए तक की डायरियां उपलब्ध हैं।
नोटपैड वाली डायरी
मालवीय रोड स्थित कुसमुद्दीन स्टेशनरी दुकान के संचालक रिजवी तनवीर ने बताया कि वर्तमान समय में कॉजेल के स्टूडेंट्स के द्वारा सबसे ज्यादा नोट पेड वाली डायरी की खरीदी की जाती है। इसके अलावा युवा वर्ग डायरी को अपने दोस्त के जन्मदिन पर या किसी अन्य अवसर पर इसे बतौर गिफ्ट देना पसंद करता है। वर्तमान समय में हमारी दुकान में लोगों के लिए कानूनी डायरी, पॉकेट डायरी, बटन डायरी, लॉक डायरी, सिम्पल डायरी, डिजाइनिंग डायरी, एक्जीक्यूटिव डायरी व अन्य प्रकार की डायरियां उपलब्ध हैं। वर्तमान समय में डायरी का यूज लिखने में कम और गिफ्ट देने में ज्यादा हो रहा है। टेलिफोन डायरी की डिमांड स्टूडेंट्स से लेकर आॅफिसर तक के पास है। मोबाइल में इतना इस्पेस नहीं होता है कि ज्यादा नम्बर सेव किए जाएं, इस कारण से भी अधिकांश लोग डायरी खरीदने में ही विश्वास करते हैं। इसलिए टेलीफोन डायरी को आज भी खरीदा जा रहा है।

एक और फाइव स्क्रीन मल्टीप्लैक्स की सौगात


राजधानी को नए साल से एक और फाइव स्क्रीन मल्टीप्लैक्स की सौगात मिलने जा रही है। पंडरी स्थित छत्तीसगढ़ सिटी सेंटर में सिने मैक्स का जिस फिल्म से शुभारंभ होने जा रहा है, उस फिल्म के सितारे इस मौके पर उपस्थित रह सकते हैं।
शेखर झा
बात चाहे ईद-गणेश चतुर्थी के दौरान रिलीज फिल्म ‘दबंग’ की हो, या दीपावली के दौरान प्रदर्शित फिल्म ‘गोलमाल-3’ की, फिल्म के सभी 50 से अधिक शो में हाउसफुल का बोर्ड सभी ने देखा। ऐसा लगता है कि तेजी से विकसित राजधानी को अभी अधिक सिने मनोरंजन के साधनों की आवश्यकता है। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए करीब 1100 दर्शकों की क्षमता वाला पांच आॅडी वाला मल्टीप्लैक्स सिने मैक्स आ रहा है। इसकी तैयारियां जोर-शोर से जारी है और इस समय यहां 75 फीसदी काम पूरा भी हो चुका है।
सिने मैक्स सूत्रों के मुताबिक मल्टीप्लैक्स का एक आॅडी 100 सीटों की क्षमता वाला है और एक 300 सीटों की क्षमता वाला। बाकी के तीन आॅडी 225 से 250 सीटों की क्षमता वाले हैं। यहां सराउंडिंग साउंड सिस्टम, स्क्रीन क्वालिटी से लेकर पुश बैक आरामदेह चेयर्स की जो सुविधा सिने दर्शकों को मुहैया कराई जाएगी, वो किसी दूसरे मल्टीप्लैक्स में उपलब्ध नहीं हो सकती। यहां का एयरकंडीशनर अन्य मल्टीप्लैक्सों से विशेष होगा और इलेक्ट्रिसिटी बैकअप वाला होगा, यानी बिजली गुल होने पर बिना जर्क यह अपने आप ही जनरेटर से शुरू ही रहेगा।
उपलब्ध मल्टीप्लैक्स
राजधानी में इस समय फोर स्क्रीन वाला आईनॉक्स, सिटी माल में है और इसकी क्षमता करीब 1350 दर्शकों की क्षमता की है। फोर स्क्रीन वाला पीवीआर, मैग्नेटो मॉल में है और यहां एक साथ करीब 1250 दर्शक एक साथ फिल्म देख सकते हैं। थ्री स्क्रीन वाले ग्लिट्ज मल्टीप्लैक्स में 800 दर्शक एक साथ तीन फिल्मों की लुफ्त उठा सकते हैं। यह आमानाका, मोहबा बाजार के पास आरके मॉल में है। टू स्क्रीन वाला कृष्णा बिग सिनेमा समता कालोनी में है और यहां 700 दर्शकों के एक साथ फिल्म देखने की सुविधा है।
आने वाले मल्टीप्लैक्स
सिटी माल से आगे ग्राम जोरा में निर्माणाधीन ट्रेजर आईलैंड फोर स्क्रीन मल्टीप्लैक्स फन रिपब्लिक जल्दी ही शुरू होने वाला है। इसी तरह धमतरी रोड पर दो निर्माणाधीन शापिंग माल पटवा बिल्डर्स का कलर्स और सिंघानिया बिल्डर्स के ----------- में भी मल्टीप्लैक्स शुरू होने वाले हैं। विधानसभा रोड पर निर्माणाधीन अंबूजा शापिंग माल में थ्री स्क्रीन मल्टीप्लैक्स आने की तैयारी की पुष्टि हो चुकी है।

मदर एक्सप्रेस रायपुर रेलवे स्टेशन पर



भारतीय रेल, नोबल पुरस्कार से सम्मानित मदर टेरेसा की जन्मशती के अवसर पर ‘मदर एक्सप्रेस’ नामक प्रदर्शनी गाड़ी चला रही हैं। मदर एक्सप्रेस का उद्देश्य मानवता के संदेश और मदर के त्याग की गाथा का प्रचार करना है
शेखर झा
मटर टेरेसा के बारे में लोग अच्छे से नहीं जानते। अधिकतर लोग मदर टेरेसा से जुड़ी काफी चीजों से वाकिफ भी नहीं है। शनिवार को रायपुर के रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म एक ए पर मदर एक्सप्रेस आई। उस ट्रेन को देखने के लिए शहर के सभी स्कूल के स्टूडेंट्स पहुंचे। इस ट्रेन को मदर टेरेसा के सौ वें जन्मदिन के अवसर पर 26 अगस्त, 2010 को कोलकाता के सियालदह स्टेशन से रेल मंत्री ममता बेनर्जी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया था। इस ट्रेन में मदर टेरेसा के जन्म से लेकर मृत्यु तक की पूरी जानकारी सम्मिलित की गई है। रायपुर के रेलवे स्टेशन पर ये ट्रेन दो दिन रहेगी। ये ट्रेन महान विभूति के जीवन और उनके लोकोपकारी कार्यों की झांकी दर्शाती है।
छ; डिब्बे एक्सप्रेस में
मदर एक्सप्रेस ट्रेन में छह डिब्बे हंै उसमें से तीन डिब्बों में मदर टेरेसा से जुड़ी सभी जानकारियां हंै। तीन डिब्बों में ट्रेन में सफर करने वाले लोग रहते हैं। ट्रेन के पहले बोगी में मदर टेरेसा के जन्म व शिक्षा के बार में, दूसरी बोगी में सामाजिक कार्यों के बारे में व तीसरे बोगी में मृत्यु व पुरस्कारों के बारे में जानकारी प्रदान की गई है। मदर एक्सप्रेस ट्रेन के इंचार्ज चंद्रशेखर प्रयाद वर्मा ने बताया कि इस ट्रेन को देश के सभी राज्यों तक ले जाना है। इस ट्रेन के आने से सभी लोग मदर टेरेसा से जुड़ी चीजों को नजदीकी से जान पाएंगे। इस टेÑन को देखने के लिए स्कूल व कॉलेज के बच्चे काफी संख्या में स्टेशन पहुंचे।
एक हफ्ते रहेगी ट्रेन छत्तीसगढ़ में
मदर एक्सप्रेस रायपुर रेलवे स्टेशन पर 30 जनवरी तक रुकेगी, इसके बाद दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर 31 व 1, बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर 2 व 3 फरवरी तक और अंत में रायगढ़ रेलवे स्टेशन पर 4 फरवरी तक मदर एक्सप्रेस ट्रेन रुकेगी। उल्लेखनीय है कि मदर एक्सप्रेस ट्रेन विगत छ: महीनों में 83 स्टेशनों से होकर गुजर चुकी है। 26 फरवरी 2011 बिहार के कटिहार रेलवे स्टेशन पर इसकी यात्रा समाप्त होगी।
पहले कोच में जन्म, शिक्षा
मदर टेरेसा का जन्म मैसेडोनिया के राजधानी स्कोपिया में 26 अगस्त को 1910 में हुआ था। मदर टेरेसा के पिता का नाम निकाला बोयाजू व माता का नाम द्राना बोयाजू था। उनके माता-पिता ने उनका नाम गोंझा अग्नेंस रखा था। 12 वर्ष की उम्र में उनको लगा कि उन्हें धर्म प्रचारक (मिशनरी) बनना है, 1928 में उन्होंने अपना घर छोड़ा और कैथलिक नन बन गर्इं। उन्होंने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया। इसके बाद वो आईरिश संस्था ‘दि सिस्टर्स आॅफ लोरेट्टो’ में शामिल हो गर्इं। भारत में मिशनरी कार्य को बढ़ावा देने के लिए उनको 6 जनवरी 1929 को कलकत्ता भेज दिया गया। जहां उनको सेंट मेरी हाई स्कूल में अध्यापिका के पद नियुक्त किया गया। सिस्टर्स टेरेसा 24 मई 1937 को मदर टेरेसा बनीं। 1948 में अपने सुपीरियर की अनुमति से उन्होने स्कूल को छोड़ कर कलकत्ता की झुग्गियों में रहने वाले गरीबों की सेवा में अपने को आपको समर्पित कर दिया।
दूसरे कोच में मिशनरीज आॅफ चेरिटीस
7 अक्टूबर 1950 को मदर टेरेसा ने अपना संगठन दि मिशनरी आॅफ चैरिटि को प्रारंभ करने के लिए होली सी से अनुमति प्राप्त की। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों की प्रेमपूर्वक देखभाल करना था जिनकी देखभाल करने के लिए कोई तैयार नहीं था। 1990 तक इसमें 40 से अधिक देशों में एक मिलियन से अधिक स्वयंसेवी बने।
तीसरे कोच में मदर के जीवन के अंतिम वर्ष
अपने जीवन के अंतिम वर्ष में कई स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद मदर टेरेसा ने गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा और समाज व चर्च के प्रति कार्य जारी रखे। मदर टेरेसा के निधन से मानवता को भारी क्षति पहुंची। 87 वर्ष की आयु में 5 सितंबर 1997 को कलकत्ता में उनका निधन हो गया।

कस्टमर को लुभाती छुट


शेखर झा
किसी सामान पर छूट मिलती है तो लोग उस सामान कोई काफी संख्या में खरीदी करते है। वर्तमान समय में शहर के ब्रांडेड व नॉन ब्रांडेड गारमेंट दुकानों में सभी प्रकार के कपड़ों को छूट दिया जा रहा है। छूठ के चलते दुकानों में लोगों की काफी संख्या में भीड़ देखने को मिलती रही है। वैसे तो गारमेंट दुकानों में फेस्टिवल में छूट दी जाती है मगर सीजन के लास्ट में भी दुकानदारों के द्वारा छूट दिया जा रहा है। दुकानदारों का मानना है कि वर्तमान समय में कमपीटिशन का दौर है। इस दौर में जो दुकान वाले के यहां जितनी छूट रहती है उतनी ही कस्मरों की भी उनके दुकान में देखने को मिलती हैं। कपड़ों पर छूट देने से ग्राहको से एक तरह से लूभाया जाता है। उन्होने बताया कि साल कपड़ो में समर सीजन व विंटर सीजन में छूट दिया जाता है। उसके चलते दुकानों में लोगों की काफी मात्रा में भीड़ देखने को मिलती है।
जितनी छूट, उतनी भीड़
बात तो सही है कपड़ों पर जितनी छूट रहेगी, लोगों की उतनी भीड़ दुकानों में देखने को मिलेगी। लाखेनगर स्थित शुर्भी साड़ी संसार दुकान के संचालक मनोज देवनानी ने बताया कि वर्तमान समय में लोग कम दामों में अच्छे सामान की खरीदी करना ज्यादा पसंद करते हंै। उनकी दुकान में चार्ली आउटला ब्रांड के कपड़े भी उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि इस वक्त शहर की अधिकतर दुकान में सामान की छूट मिल रही है। वर्तमान समय में सभी कपड़ों व जींस पर 70 से लेक र 80 फीसदी तक छूट दी जा रही है। सभी दुकानदार चाहते हंै कि ग्राहकों की भीड़ सबसे ज्यादा उनकी ही दुकान में रहे। इसके चलते ही कंपनी की छूट के साथ कई बार दुकानदार भी अपनी तरफ से सामान पर छूट देते हंै। उस छूट के चलते दुकानों में लोगों की काफी भीड़ देखने को मिलती है। हमारी दुकान में बच्चे व लेडीज कपड़ों के सामान पर भी 10 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक की छूट दी जा रही है।
छूट का आधार
गोदाम में सामान का स्टॉक ज्यादा होने के चलते या फेस्टिवल के चलते सामान पर छूट दी जाती है। वर्तमान समय में युवाओं के द्वारा काफी स्टाइलिश कपड़ों की खरीदी की जाती है। दुकानदारों का कहना है कि जब किसी मौसम सीजन खत्म होने को होता है तब छूट दी जाती है। छूट देने के चलते सामान की भी बिक्री हो जाती है। महंगाई के चलते वर्तमान समय में सभी चीजों के दाम काफ भी बढ़ गए हैं। कितने लोग ऐसे भी होते हंै जो दुकान में छूट देखकर आते हैं और काफी संख्या में सामान की खरीदी भी करते हंै।
सीजन के लास्ट में छूट
आमापारा चौक स्थित वुडलेंड शोरुम के मेनेजर रिक्की टी एस ने बताया कि शोरुम में शर्ट, जींस के अलावा सीजन वाले कपड़े शामिल हंै। गारमेंट्स पर 40 फीसदी व फुटवेअर पर अपटू 50 फीसदी तक का डिस्काउंट दिया जा रहा है। विंटर सीजन खत्म होने वाला है इसलिए स्वेटर, जैकट व विंटर सीजन वाले कपड़ों पर छूट दी जा रही है। इसके चलते भी छूट दी जा रही है। बिना छूट के अक्सर ब्रांडेड सामान इतने मंहगें होते हैं जिनकी खरीदारी कर पाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता है।

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

नापाक दलीलों को वकालत का नाम मत दो















-कुमार जगदलवी
मो. 9300436513
क्या कहा तुमने
मिस्टर राम
श्रीमान सेन
राष्ट्र-राज्य के
विध्वंसकों के
समर्थक नहीं
पेशे से डाक्टर हैं?
सेन थैली में
नक्सलियों के मैसेज
लटकाए घूमने वाले
कुरियर नहीं
सेंट्रल जेल में बंद
सान्याल का इलाज
करने वाले डाक्टर हैं।
इसलिए वे विनायक हैं
तुम यही साबित करना
चाहते हो न राम?
क्या तुम्हें
यह पता नहीं कि
मिस्टर सेन, अरुंधति राय, मेधा पाटकर,
राजेंद्र सच्चर, सायल और अग्निवेश जैसों ने
ना सिर्फ मानवाधिकार
का अर्थ बदला है
बल्कि, अपने नाम के
हिज्जे तक बदल दिए हैं
तुम तो विनायक का अर्थ
जानते होगे राम?
या अपने नाम के समान
इसे भूल गए
कि राम अब
रावण के खिलाफ नहीं
आसुरी शक्तियों के
समर्थन में खड़ा है
विनायक का मतलब
दामोदर राव सावरकर नहीं
अंग्रेजी के ‘वी’ अक्षर से जुड़ा
नायक हो गया है,
‘वी’ - नायक यानी
विलेनों का नायक
एक ऐसा हमदर्द
जिसे ताड़मेटला के
जंगलों में तड़पे
क्षत-विक्षत होते
दम तोड़ते
छिहत्तर
मां के सपूतों का
दर्द नहीं खींचता
गांवों में बेहोश होती
जंगलों में मुखबिरों के नाम पर
सैकड़ों काट डाले गए
मजलुमों की बीवियों की चीख
नहीं सुनाई देती
अनगिनत लाशों के
चेहरे से कफन हटाती
कांपती, थरथराती
बहनों की हाथों में सजी
राखी की थाली से बुझे हुए
कपूर के धुएं की काली
लकीरें नजर नहीं आती
मिस्टर जेठमलानी
तुम्हें तनिक भी
ग्लानि नहीं कि
तुम सिर्फ ऐसे-वैसों
के ही केस लेते हो,
लड़ते हो
सुप्रीम अधिवक्ता
होने का दम भरते हो?
मिस्टर राम
उस वक्त तुम्हारी
हेठी कहां थी
जब
सन चौरासी की मांए
छाती पीट रही थीं
जेसिका लाल के परिजन
न्याय के लिए दर-दर
भटक रहे थे।
आरुषि की फाइलें
बंद हो रही थीं
क्या कहा
तुमने राम
तुम दौलत के लिए नहीं
अपने पेशे और व्यवस्था
के लिए लड़ते हो?
तो आओ
हम तुम्हें
दौलत भी देंगे
अफ्रीका में काले-गोरे का
भेद मिटाने वाले
गांधी की तरह
अनंतकाल तक नहीं
मिटने वाला
शोहरत भी
ऐसे मामलों की फाइलें
एक-दो नहीं
सैकड़ों में हैं
इन्हें अदालतों में
न्याय दिलाकर
तुम्हारी कई पीढ़ियां भी
तर जाएंगी
महात्मा की तरह
अमर हो जाएंगी
काश्मीर-गोधरा से शुरू कर
बिहार के हैबसपुरा
उत्तर प्रदेश के मेरठ
सहारनपुर, उड़ीसा की
बेलपहाड़ी, असम के
तिनसुकिया, कोंकड़ाझाड़
से लेकर पश्चिम बंगाल के
लालगढ़,
एमपी से आंध्रप्रदेश तक
वैसे तो
हजारों फाइलों में
अस्सी हजार जिंदगियां
न्याय की आस में
भटक रही हैं
तुम तो बस
छत्तीसगढ़ के
सात जिले भी नहीं
सिर्फ
बस्तर-दंतेवाड़ा के
कैंपों में सिसक रहे
निरीह बचपनों के आंखों से
सपने छीनकर आंसू भरने
वाले दरिंदों को
फांसी नहीं
सिर्फ
सींकचों के पीछे
पहुंचा दो
इतना तो तुम
कर सकते हो न
आईपीसी के म्लानी?
चलो, इतना छोड़ो
जिंदगी के अपने
आखरी पड़ाव में
दिल्ली को छोड़
बिहड़ों और जंगलों में
कहां तक
भटकोगे मिस्टर राम
तुम तो बस
इतना कर दो
आदर्श सोसायटी के
वाजिबों को
उनका हक
दिलवा दो
अगर, इतना भी  नहीं
कर सकते
तो तुम्हें
कोई हक नहीं
भारतीय लोकतंत्र और
उसकी न्याय व्यवस्था को
शक की निगाह से
देखने वाले यूरोपीय
पर्यवेक्षकों को
शह देने का
अपनी नापाक दलीलों को
वकालत के पाक पेशे का
नाम देने का...


मुन्नी शीला नहीं, बात हो राजनीतिक की


भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति इरानी महिला आयोग से बेहद खफा हैं और मानती हैं कि यह तरीके से काम नहीं कर रहा है।
मनीष सिंह
भाजपा महिला मोर्चा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में शिरकत करने आई मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति ईरानी ने रविवार दोपहर पत्रकारों से रुबरु होकर कहा कि लोग मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी नहीं देखें। जनता से आग्रह से है कि वे ऐसी फिल्मों से परहेज करें। वे •ाी यहां इन मुद्दों को लेकर नहीं आई हैं, बल्कि राजनीतिक चर्चा करने आई हैं।
दोनों गानों पर प्रतिबंध के सवाल को वे टाल गर्इं। श्रीमती ईरानी का मानना है कि परिवार ही बच्चे को संस्कार देता है। उन्हें क्या दिखाना है, क्या पढ़ाना है, यह हमारी जिम्मेदारी है। टेलिविजन चैनलों पर अश्लीलता रोकने के लिए उन्होंने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी को चिट्ठी लिखी है। इसमें उन्होंने हर चैनल से कोड आॅफ कंडक्ट बनवाने कहा है। मंत्रालय ने उनकी चिट्ठी को तवज्जो नहीं दी। मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष महिला आयोग पर जमकर बरसीं। उन्होंने आयोग पर अपने अधिकारों का ठीक तरीके से उपयोग नहीं करने का आरोप लगाया। बांदा रेप केस एवं इंग्लैण्ड में भारतीय राजदूत द्वारा पत्नी को प्रताड़ित करने के मामले पर आयोग की चुप्पी की आलोचना की। श्रीमती ईरानी ने बताया कि बांदा जाकर उनकी टीम पीड़ित लड़की से मिलीं एवं आंदोलन कर पुलिस अफसरों को सस्पेंड कराया। बिहार के रुपम पाठक मामले के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे फिलहाल वहां नहीं गर्इं हैं। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मामले की निष्पक्ष जांच करवा रहे हैं। लिहाजा उन्होंने वहां जाना मुनासिब नहीं समझा।
हर बूथ में एक महिला
श्रीमती ईरानी ने कहा कि मोर्चा ने बूथ लेवल तक अपनी पकड़ मजबूत करने का प्लान बनाया है। हर बूथ में मोर्चा की एक सदस्य की तैनाती होगी, जिससे सरकार की उपलब्धियां एवं नीतियां ग्रासरुट लेवल तक पहुंचे। ग्रासरुट लेवल की महिलाओं को मोर्चा से जोड़ने का काफी प्लान है।
भरष्टाचार पर वार
वे महंगाई, महिला आरक्षण बिल एवं भरष्टाचार पर केंद्र पर खूब बरसीं। सरगुजा एवं बस्तर इलाके की आदिवासी लड़कियों की अवैध ट्रैफिकिंग के सवाल में वे उलझ गई। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी बात की खबर नहीं।
महिलाओं की तरक्की
श्रीमती ईरानी ने पार्टी की कुछ महिला नेताओं का नाम गिनाते हुए इसे तरक्की का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि आदिवासी इलाकों में महिलाओं की बेहतरी के लिए मोर्चा काफी कु२छ कर रहा है। कार्यसमिति की बैठक में आर्इं झारखंड की आशा लकड़ा ने आदिवासी महिलाओं की तरक्की में बहुत योगदान दिया है।

बिहार में चल पड़ा विकास का रथ


अवधेश मिश्रा
बिहार चुनाव 2010 में नीतीश सरकार की बल्ले-बल्ले और लालू के जंगल राज का खात्मा। लगता है कि बिहार के परिदृश्य को बदल देने की यह शुरुआत है। बिहार के मतदाताओं ने लालू यादव के जातीय समीकरण, मायावती की सोशल इंजीनियरिंग और रामविलास पासवान की दोहरे राजनीतिक चंगुल से निकल कर सड़क, सुरक्षा और शिक्षा को प्राथमिकता दी। लगता है गांवों की भोलीभाली जनता भी अब इन राजनीतिज्ञों की नीयत को भलीभांति समझ गयी है। वहां की जनता ने अपनी एक वोट से यह साबित कर दिखाया है कि अब हमें जाति, धर्म की राजनीति नहीं विकास चाहिए। पटना की जनता सड़कों पर उम्मीदों को मन में लिए चुनाव परिणामों को लेकर जश्न मनाना शुरू कर दिया है। बिहार में होने वाले चुनाव आम आदमी की एक गौरवपूर्ण जीवन जीने के साहस और उनकी उम्मीदों का प्रतीक हैं। इस तरह से यह नीतीश कुमार से ज्यादा बिहार की जनता की जीत है जिसने सभी प्रतिकूल परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए जीत दर्ज की। बिहार की जनता ने जाति, अपराध, भ्रष्टाचार की गंदी राजनीति के खिलाफ़ विद्रोह करके नीतीश कुमार के सोशल इंजीनियरिंग में विश्वास किया है। इसमें कोई शक नहीं कि 2010 के बिहार चुनाव वतर्मान राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देने की प्रक्रिया की शुरुआत हैं। इन चुनावों ने जनता की प्राथमिकता में निर्णायक बदलाव लाए हैं।नीतीश ने अगर 2005 के चुनावों में लालू यादव और राबड़ी देवी के जंगल राज को हराया तो वहीं 2010 के चुनावों में जातिधर्म की राजनीति से ऊपर उठकर सड़क, बिजली, पानी और विकास के नाम पर जीत हासिल की। दो तिहाई बहुमत के साथ विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस के अभिमान को चूरचूर कर दिया है। वहीं कांग्रेस जो राहुल गांधी के सहारे बिहार की सत्ता पाने की कोशिश में लगी है, बिहार की जनता ने राहुल को भी नकार दिया है। नीतीश कुमार की छवि एक ऐसे नेता के रूप में उभरकर आई है जिन्होंने राजनीतिक विश्वास को जीता है और बिहार के उस अतीत को फ़िर से वापस लाने की पहल की है, जिसे हर बार बिहार के गौरव से जोड़कर देखा जाता रहा है। नीतीश की जीत में महिलाओं की ऐतिहासिक भागीदारी ने बहुत बड़ी भूमिका निभायी है। जिस राज्य में अभी तक यह माना जाता था कि उनका वोट घर के पुरुषों के निर्देश पर निर्भर है। इसीलिए मतदान में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम होती थी। नीतीश कुमार ने बिहार की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास किया। संभवतया यह एक बड़ा कारक था जिसके चलते मतदाता, खासकर महिलाएं निडर होकर मतदान के लिए पहुंचीं। जहां लड़कियां गुंडागर्दी के डर से स्कूल नहीं जाती थीं, वहीं नीतीश की सरकार में साइकिल से स्कूल जाने लगीं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ बलात्कार की घटनाओं में अभूतपूर्व कमी आयी। इन्हीं बातों से नीतीश के प्रति महिलाओं ने अपना विश्वास जताया और मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। नीतीश की पार्टी को अकेले 100 से ऊपर सीटें मिलने की वजह से उन्हें भाजपा व आरएसएस की हां में हां नहीं मिलाना पड़ेगा। वह निर्भीक होकर अपना निर्णय ले सकेंगे। जो लोग नीतीश को प्रधानमंत्री बनने की बात करते हैं वह समय से पहले की बात के साथ में गलत भी है। क्योंकि बिहार की जनता ने नीतीश को अपना वोट राज्य की दुदर्शा सुधारने के लिए दिया है। जो बिहार की हालत बदतर हो चुकी थी उसे सुधारने के लिए एक अच्छे विकासशील मुख्यमंत्री को अपना वोट दिया है। बिहार अयोध्या जैसे विवादित मुद्दों से दूर निकल चुका है। इस बार जब यह मुद्दा कुछ राज्यों को अपनी तपिश की आग में समेटे था, उस समय भी बिहार की जनता में इसके प्रति कोई दिलचस्पी नहीं देखी गयी। हालांकि हिंदूवादी पाटिर्यों के अगुवा माने जाने वाले नरेंद्र मोदी और बाला साहब ने भी नीतीश की तारीफ करते हुए उन्हें बधाई दी है। बिहार की जनता को अब सिर्फ विकास चाहिए इसीलिए राज्य के लोगों ने नीतीश को यह जनादेश बिहार में सामाजिक क्रांति के उनके अधूरे कामों को पूरा करने के लिए दिया है। एक इंजीनियर के रूप में नीतीश की प्रतिभा राज्य में सामाजिक बदलाव की रूपरेखा तैयार करने में भी साफ झलकती है। दूसरी बार भी विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद नीतीश का दायित्व और अधिक बढ़ गया है। एक इंजीनियर के रूप में नीतीश की प्रतिभा राज्य में सामाजिक बदलाव की रूपरेखा तैयार करने में भी साफ झलकती है। लेकिन फिर भी उन्हें अपनी नीतियां बनाते समय एक ओर जहां मध्यवर्ग और शहरों को ऊपर उठाने का प्रयास करना होगा, वहीं इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि गांव और गरीब इस विकास से अछूते नहीं रह जाएं। नीतीश को ऐसी शानदार सफलता नहीं मिल पाती, यदि गरीब, उपेक्षित तबके और खासकर नक्सल प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों ने उन्हें अपना समर्थन नहीं दिया होता। इसलिए सभी विकास कार्यक्रमों में उन्हें गरीबों और उपेक्षितों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। आए दिन राज्य की भोली-भाली जनता नक्सलियों के चंगुल में फंस जाती है। इसलिए अब उन्हें नक्सलियों को भी बातचीत के लिए आमंत्रित करना होगा। नीतीश यदि अपने किए वायदों पर खरा नहीं उतर पाते हैं तो उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। हालांकि नीतीश से ऐसी उम्मीद नहीं है। क्योंकि पिछले 5 वर्षों में उन्होंने जनता से किए वायदों को पूरा किया है तभी जनता ने उनपर दोबारा भरोसा जताया है । लालू की हार का मतलब है कि यादवों ने भी लालू का साथ छोड़ दिया है। राजद की हार से स्पष्ट हो गया है कि लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में हाशिये पर पहुंच गये हैं। लालू का कहना है कि वे उन रहस्यों का पता लगाएंगे जिसकी वजह से उनकी हार हुई। लेकिन सच तो यह है कि उन्हें आत्मंथन करना चाहिए। गुंडे, माफियाओं को पार्टी से बाहर निकालना चाहिए और संकीर्ण राजनीति की बजाय व्यापक राजनीति करनी चाहिए। अगर राम विलास पासवान की बात करें तो उन्होंने अभी तक सिर्फ सत्तासुख ही भोगा है। जहां सत्ता देखी वहीं चिपक गए। लेकिन अब उनके साथ एक दुर्भाग्य जुड़ गया है। वह जिस पार्टी में जाते हैं वह सत्ता से बिलग हो जाती है। इसलिए अर्से बाद यह पहला मौका है जब पासवान ना तो केंद्र में हैं और ना ही राज्य में। इस चुनाव से एक बात और साबित होती है कि जिस भाजपा के माथे पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगा दिया गया हो वह भी इससे उबरती नजर आ रही है। क्योंकि इस जीत में भाजपा के सुशासन का ही योगदान है। इस जीत का मतलब है कि राममंदिर की राजनीति का खात्मा।

प्यारा नाम, हुआ बदनाम



रमेश श्रीवास्तव

कितना प्यारा नाम है शीला और मुन्नी लेकिन आज कल मनचलों की जुबान इस नाम से घिस रही है.समाज में इन दो नामों शीला और मुन्नी पर जंग और बहस छिड़ती नजर आ रही है. शीला और मुन्नी की महिलाएं और लड़कियां दुबककर बैठ गई हैं, क्योंकि उन्हें देखकर सहेलियां या शरारती लड़के गाना शुरू कर दे रहे हैं पूरब ने कभी सोचा ही नहीं था कि हमारी प्यारी मुन्नी आगे चलकर बदनाम हो जाएगी. शीला पर लोग अपनी गलत नजर रखेंगे. बड़े-बुजुर्ग लड़कियों को प्यार से बचपन में मुन्नी और शीला कहकर बुलाते हैं. आगे चलकर वही नाम हो जाता था. आज यही नाम फिल्म जगत से निकलकर गलियों सड़कों पर बदनाम चल पड़ा है.दबंग में मलाइका ने ह्यमुन्नी बदनाम हुई गाने पर डांस किया है. वहीं फिल्म ह्यतीस मार खांह्ण में कैटरीना कैफ ने शीला की जवानी पर अपना जलवा बिखेरा है. आज कल दो आइटम सांग ह्यमुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी की धूम मची हुई है. हर तरफ यही दो गाने सुनाई दे रहे हैं. लेकिन गानों को लेकर महिलाओं के एक तबके में खासी नाराजगी है.कई महिला संगठनों ने इन गानों पर रोक लगाने की मांग की है. एनसीआर के नोएडा शहर में इन गानों को रुकवाने के लिए ज़ोरदार प्रदर्शन किया. ऐसे गानों से किसी को परेशानी हो तो सवाल उठना लाज़मी है. पाटिर्यों में शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी छा गई है. लोग इस पर थिरकते हुए नजर आ रहे हैं. मुन्नी और शीला के गाने पर रोक लगाने के लिए बंबई हाई कोर्ट के बाद वाराणसी की एक स्थानीय अदालत और इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इनके खिलाफ याचिका तक दायर की जा चुकी है. महिलाओं का आरोप है कि शीला और मु्न्नी नाम की महिलाओं को इससे काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है. मनचले उन्हें छेड़ने के लिए इन गानों का इस्तेमाल कर रहे हैं. वैसे फिल्मी गानों में महिलाओं के नामों का इस्तेमाल पहले भी होता रहा है. फिल्म दबंग और तीस मार खां में मुन्नी और शीला को जिस रूप में पेश किया गया है, उस पर असल आपत्ति यही है. समाज वास्तविक मुन्नियों और शीलाओं को उसी रूप में देखने लगा है. मप्र की अदालत ने फिल्म दबंग के गाने ह्यमुन्नी बदनाम हुई अश्लील करार दिया. तीन मनचलों ने मुन्नी नाम की एक लड़की को इस गीत को गाकर छेड़खानी की. लड़की की शिकायत के बाद मामला अदालत पहुंचा, जहां तीनों की अंतरिम जमानत की अर्जी को कोर्ट ने खारिज कर दिया. वाराणसी में तीस मार खां फिल्म के गाने ला की जवानी का जमकर विरोध किया गया. स्थानीय अदालत में इस गाने को फिल्म से हटाने के लिए याचिका दायर की गई थी पर अभी तक उस पर कोई भी फैसला नहीं आया.दनकौर के निकट राजपुरकलां गांव में एक समारोह के दौरान शीला की जवानी गाना बजने पर दो पड़ोसियों में जमकर मारपीट भी हो चुकी है लोगों के मुताबिक शीला एक साधाराण नाम है जो हर दूसरी महिला या लड़की का होता है. इस गाने पर लड़कों ने लड़कियों को छेड़ना शुरू कर दिया है. इस अभद्र शब्द को गाने से हटा दिया जाए या फिर पूरा गाना ही फिल्म से हटा दिया जाए. वैसे इससे पहले फिल्म त्रिदेव के ओए-ओए गीत ने धूम मचाया था. फिल्म सौदागर का इलु-इलु भी मनचलों के लिए छेड़छाड़ का जरिया बन गया था. शीला और मुन्नी को लेकर गाने बनाने वालों को चाहे जितनी ही शोहरत और आमदनी हुई हो लेकिन ये गाने उन महिलाओं के लिए आफत बन गए हैं जिनके नाम शीला या मुन्नी है. गाने से अलग अच्छी शुरुआत के बावजूद फिल्म तीस मार खां ने बाक्स आफिस पर दम तोड़ना शुरू कर दिया है. इस बात से फराह को काफी निराशा पहुंची है. शीला और मुन्नी गाने का लफड़ा बढ़ता ही जा रहा है. देखिए आगे क्या गुल खिलाएगा.

सोमवार, 24 जनवरी 2011

कटरीना और प्रियंका के घर इनकम टैक्स का छापा



बॉलिवुड ऐक्ट्रेस कटरीना कैफ और प्रियंका चोपड़ा के घरों पर सोमवार सुबह इनकम टैक्स अधिकारियों ने छापे मारे। टीवी चैनल की रिपोर्ट्स के मुताबिक इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों कटरीना और प्रियंका चोपड़ा के घर पर सोमवार सुबह करीब 7.30 बजे छापे मारे। सूत्रों के मुताबिक दोनों ऐक्ट्रेसेज ने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय गलत जानकारी दी थी और वास्तविक इनकम के बारे में भी उचित जानकारी नहीं दी। इनकम टैक्स के अधिकारी दोनों ऐक्ट्रेसेज के मैनेजरों से भी पूछताछ करेंगे। छापेमारी खत्म होने के बाद ही मामले की पूरी जानकारी मिल पाएगी।

रविवार, 23 जनवरी 2011


लता दीदी का बचपन



लता जब महज पांच वर्ष की थी, तब चेचक की शिकार हो गई। चेचक का हमला इतना भारी था कि हर किसी को आशंका थी कि वह चल बसेगी या फिर चेहरा कुरूप हो जाएगा। जब मां उसे लोरियां सुनाती तो रोती-कलपती बच्ची अकसर उनका साथ देती थी
हरिशरन शुक्ल

लता का जन्म 28 सितम्बर, 1929 को हुआ। गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर की पत्नी गायिका नमर्दा मंगेशकर ने कन्या के रूप में गायन क्षेत्र के इतिहास लता को जन्म दिया। जब वह पांच वर्ष की थी, तब चेचक की शिकार हो गई। चेचक का हमला इतना भारी था कि हर किसी को आशंका थी कि वह चल बसेगी या फिर चेहरा कुरूप हो जाएगा। जब मां उसे लोरियां सुनाती तो रोती-कलपती बच्ची अकसर उनका साथ देती थी। उनका चेहरा इतना सूज गया कि एक कौर भी निगलने में दिक्कत होती थी। इसलिए बूंद- बूंद दूध पिलाया जाता था। वह रोती रहती। डॉक्टर को उसकी आंखों की रोशनी जाने का डर था। इस भयंकर बीमारी की चपेट में वह पूरे तीन महीने रही। इसके बाद, जब लता की आंखें फिर से सब कुछ देखने लगीं और उसकी आवाज सलामत रही तो पिता ने स्थानीय बाजे वाले को बुलाया। मां ने अनाज-नारियल और महंगी साड़ियां शगुन के तौर पर बांटी और बेटी का पुनर्जन्म मनाया। अब लता के पिता उसे दोगुने उत्साह से संगीत सिखाने लगे लेकिन अकसर नाटक के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता था। उन्हें यह भी अहसास नहीं हुआ कि उनकी बेटी ने कितना संगीत सीख लिया और वह भी अपने बूते पर। स्टेज पर लता का पहली बार उतरना महज संयोग ही था। लता जब करीब सात वर्ष की थीं तब उसके पिता पूरे परिवार को मनमाड ले गए। वहां सौभद्र का मंचन होना था। नारद की भूमिका निभाने वाला कलाकार प्रदर्शन के पहले बीमार पड़ गया। घबराहट फैल गई लेकिन शांतचित्त लता ने अपने घबराए पिता से कहा, ह्णचिंता मत कीजिए बाबा। मैं, मां और भाई के साथ चारों बहनें नारद की भूमिका निभाऊंगी। मुझे सारे गाने याद हैं, संवाद भी याद है। बेटी के आग्रह को दीनानाथ ने गंभीरता से लिया क्योंकि उसके हावभाव से उन्हें आशा की किरण दिखाई दी। फिर भी एक समस्या थी। अजरुन (दीनानाथ) की भूमिका करने वाला नायक 36 साल का था जबकि नारद सिर्फ सात साल का था। अब फैसला करना था। परदा उठा और छोटा-सा नारद मंच पर आया, अनुभवी कलाकार की जगह एक बच्चे को देखकर दशर्कों के बीच आशंका की लहर दौड़ गई। मास्टर दीनानाथ भी पर्दे पर उत्सुकता से देख रहे थे। हारमोनियम वादक ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ सुर भरे। उसे कैसे पता चलता कि इसी संकेत का तो लता इंतजार कर रही है। छोटे नारद ने अपने होंठ हिलाए और स्वाभाविक रूप से शब्द, सुर और लय पूरी त्कग््रफ२कित्कक के साथ दृश्य की मांग के अनुरूप फूटे। दर्शक अवाक रह गए और जोरदार तालियां बजीं। 42 वर्ष की उम्र में पिता दीनानाथ चल बसे। इसके बाद परिवार विपत्तियों में फंस गया। पिता के साथ काम करने वालों या किसी अन्य ने लता के परिवार की सुध नहीं ली। लता का परिवार 12 से 14 घंटे कड़ी मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से दो समय की रोटी जुटा पाता था। ऐसे विख्यात पिता की याद में उनकी बरसी पर संगीत का कोई कार्यक्रम करना असंभव लग रहा था। आखिरकार, अनुभवहीन मां और 15 बरस की लता ने यह जिम्मेदारी अपने ही कंधों पर उठाने का फैसला किया और स्मृति समारोह कोल्हापुर के पैलेस थियेटर में हुआ। इस समारोह में अनेक जाने-माने संगीतकार आए। लता ने पिता की तस्वीर को पुष्पहार पहनाया, तानपुरा उठाया और तुरंत ही संगीत के उन सुरों में खो गई जो उसने सीख-सृजित किए थे। उस रात घर लौटने के बाद मां ने उसे प्यार से झिड़का, गाते समय तुम्हारे चेहरे पर तनाव था। तुम्हारे बाबा कभी ऐसा नहीं करते थे। दूसरी पुण्यतिथि पर गाते समय लता के चेहरे पर किसी तरह का तनाव नहीं था।

बेजोड़ घड़ियों का बदकिस्मत निर्माता


प्राचीन काल में समुद्री यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा कठिनाई दिशा को लेकर होती थी और इसी कोशिश में नाविक उन स्थानों पर भी पहुंच जाया करते थे, जहां जाने का उनका इरादा नहीं होता था। कई बार गलत दिशा की वजह से ही जहाज दुर्घटना का शिकार भी होते थे

एक बार ऐसी ही दुर्घटना सन 1707 में हुई, जब फ्रांसीसी सेना को करारी मात देने के बाद एडमिरल सर क्लाऊ डिस्ले शौकेल इंग्लैंड लौट रहे थे। दिशा का ठीक से पता न होने की वजह से उनके जहाज छोटे से द्वीप समूह से जा टकराये। इस दुर्घटना में चार जहाज वहीं डूब गए और 1600 लोग मारे गए। इतनी बड़ी हानि ने पूरे इंग्लैंड को हराकर रख दिया। इसके तुरंत बाद ब्रिटिश संसद ने एक बिल पारित किया। इसे नाम दिया गया-ह्यलांगीट्यूट एक्ट आॅफ 1714ह्ण। एक्ट के अनुसार, जो व्यक्ति लांगीट्यूड यानी देशांतर का सही पहचान करने वाला उपकरण बनाएगा, उसे 20,000 पाउंड (आज के लगभग दस करोड़ रुपये) इनाम दिये जाएंगे। दूसरी शताब्दी में एक वैज्ञानिक टॉल्मी ने धरती को क्षैतिज यानी दाएं से बाएं जाने वाली तथा ऊपर से नीचे आने वाली रेखाओं में बांटा। क्षैतिज रेखाओं को अक्षांश व लम्बवत रेखाओं को देशांतर रेखा कहा गया। यदि क्षैतिज व लम्बवत रेखाओं का सही ज्ञान हो तो नाविक समुद्र में अपनी स्थिति आसानी से पता लगा सकते हैं। अक्षांश का ज्ञान सूर्य या किसी ज्ञात तारे को ऊंचाई से आसानी से हो जाता है पर देशांतर रेखा का पता समय को देखकर होता है, किंतु उस समय यह संभव न था। पेंडुलम की लंबाई ताप के अनुसार बढ़ती धरती तो है ही, समुद्री यात्राओं में जहाज को जो हिचकोले लगते हैं, उनसे पेंडुलम एक निश्चित गति से चल ही नहीं पाता। आज पूरी दुनिया के ठीक बीचोंबीच दो रेखाएं हैं। एक है इक्वेटर यानी भूमध्य रेखा, जो पूरी पृथ्वी को ऊपरी व निचले हिस्से में बांटती है और दूसरी वह रेखा जो पृथ्वी को पूर्व व पश्चिम हिस्से में बांटती है। इंग्लैंड की रॉयल वेधशाला, ग्रीनविच नामक स्थान पर है, इसमें एक फाइबर आॅप्टिक प्रकाश किरण ही इस रेखा को दर्शाती है। इसी स्थान से दुनिया का निर्धारण होता है। इस रेखा से दाएं आने पर समय क्रमश: बढ़ता है व रेखा के बाएं जाने पर घटता है। अगर आज किसी को अपने देश के समय का ज्ञान हो तो समुद्री यात्रा के समय का अंतर निकाल वह आसानी से देशांतर रेखा पता लगा लेगा, पर काफी पहले पेंडुलम की घड़ियां समुद्री यात्रा के मामले में बेकार साबित हुई थीं। जब इंग्लैंड सरकार ने देशांतर रेखा की समस्या से निपटने के लिए भारी- भरकम इनाम रखा, तो इनाम के बारे में सुनकर एक घड़ी निर्माता ने ठान ली कि वह यह इनाम जरूर जीतेगा। इस घड़ी निर्माता का नाम था- जॉन हैरीसन। हैरीसन का जन्म 1693 में हुआ था व 1720 तक वह सुंदर व बेजोड़ घड़ियां बनाने के लिए मशहूर हो चुका था। 1722 में उसने लिंकनशायर मीनार के लिए जो घड़ी बनाई, वह आज भी सही समय बताती है। वह आम लोगों के लिए भी घड़ियां बनाता था। समुद्री हिचकोले में घड़ी न हिले और पेंडुलम के दोलन पर विपरीत असर न हो, इसके लिए जॉन ने ऐसी घड़ी बनाई जो बच्चों के खेल ह्यसी सॉह्ण यानी झूमा- झूमी जैसी थी। जैसे ही घड़ी पर एक ओर दबाव पड़ता, घड़ी स्वयं ही खुद को सीधा कर लेती। इस घड़ी में पीतल की छड़ें और तुलना लगी थी और डायलों की संख्या चार थी। एक डायल घंटे, दूसरा मिनट, तीसरा सेकेंड व चौथा महीने के दिनों को दर्शाता था। इसका वजन था- 35 किलो। जांच के लिए इस घड़ी को जहाज पर रखकर लिस्बन तक रवाना किया गया। रास्ते में मौसम खराब होने की वजह से जहाज दूसरी दिशा में चला गया। वह स्थान घड़ी के अनुसार लिस्बन नहीं, लीर्जड होना चाहिए। बाद में हुई जांच में यह बात एकदम सही पायी गयी। 23 वर्ष बाद घड़ी को परखने के लिए लांगीट्यूड समिति के सदस्यों की फिर बैठक हुई। जॉन को लगा कि उसकी घड़ी में कुछ कमी है, इसलिए उसने सदस्यों से कहा कि वह घड़ी फिर बनाएगा। चार साल बाद 1741 में हैरीसन ने एच-2 घड़ी बनाई और वह इसे लेकर समिति के सदस्यों के पास गया। घड़ी काफी भारी थी व यह भार ही जॉन को खटक रहा था। जॉन ने सदस्यों से कहा कि अगर उसे समय दिया जाए, तो वह हल्की घड़ी तैयार कर लेगा। फिर उसने एच-3 नाम की घड़ी तैयार की, पर इसको बनाने में उसे 19 साल लग गये। यह घड़ी उसने अपने बेटे विलियम के साथ बनाई थी, जो दो फुट ऊंची व 27 किलो की थी। घड़ी का भार अब भी ज्यादा था, इसलिए जॉन ने 1759 तक एच-4 नाम की घड़ी बना डाली, जो मात्र 1.4 किलो की थी। घषर्ण समाप्त करने के लिए घड़ी के भीतर हीरे लगे थे। 1760 में जॉन हैरीसन की घड़ी समिति के सामने रखी गई व इसे जांच के लिए जहाज में रखकर जमैका भेजा गया। यात्रा में मात्र 5 सेकेंड की त्रुटि आयी। जॉन इनाम का दावेदार हो गया, पर एक व्यक्ति नेविल मास्केलोनो ने दावा किया कि चांद की दूरी नापकर देशांतर रेखा का पता लगाना उसने पहले ही खोज लिया है। जॉन को मात्र डेढ़ हजार पाउंड मिले, वह भी यह कहकर कि इस घड़ी से लोगों को लाभ मिलेगा। 1964 में जॉन एच-4 के परीक्षण के लिए दोबारा समुद्री यात्रा पर निकले। उनकी घड़ी ने इंग्लैंड के मापदंडों से तीन गुना बेहतर तरीके से देशांतर रेखा मापी, फिर भी उसे दस हजार पाउंड ही मिले। पूरे इनाम के लिए जॉन को एच-4 जैसी दो घड़ियां और बनानी थीं, ताकि पता चल सके कि इस तरह की घड़ियों को व्यापक तौर पर बनाया जा सकता है। पहली एच-4 घड़ी सरकार ने ले ली और जॉन को याद्दाश्त से ही घड़ियां बनानी पड़ीं। पहली घड़ी का नाम रखा गया एच- 5, अगली घड़ी एच-6 बनाते-बनाते जॉन की आयु 77 साल की हो गई और उसकी नजर कमजोर पड़ने लगी। जॉन के इन कष्टों को देख उनके पुत्र विलियम ने सम्राट जॉर्ज तृतीय को पूरा विवरण लिख भेजा। संसद ने सम्राट के कहने पर 8750 पाउंड जॉन को और दिए। एच 1, 2 व 3 आज भी रॉयल वेधशाला में रखी हैं व सही समय देती हैं। ये घड़ियां उस आदत की याद दिलाती हैं जो कभी हारा नहीं और बेहतर तकनीक के लिए दशकों तक काम करने की हिम्मत रखता था।

आग का दरिया है, नंगे पांव चलना है


पटना .एक आग का दरिया है। उसपर कुछ लोग नंगे पांव चल रहे हैं। चलने वालों में कमसिन बच्चे भी हैं। उनकी पेशानी पर न कोई शिकन है और न चेहरे पर दर्द का एहसास। होठों से चीख या उफ भी नहीं निकलती। पास खड़े जायरीनों को शोलों की तपिश महसूस होती है। मगर चलने वालों का जज्बा ऐसा कि जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो। यह सारा मंजर है पटना सिटी के नौजरकटरा इमाम वारगाह के करीब अंजुमने-पंजतनी के जेरे-एहतमाम शोला मातम का। जाड़े की सर्द रात का भी देर तक जगाये रखा मातम करने वालों ने। हजरत इमाम हुसैन हक व सदाकत (सच्चाई) के लिए अपनी आंखों के सामने अहलो-अयाल को कुर्बान करना गवारा कर लिया लेकिन एक फासिक व फाजिर की बैत कबूल न की। उन्होंने अपने जांनिसारों के साथ हक व वातिल की राह में दीने-इस्लाम को बचाने के लिए मैदाने- कबर्ला में अपनी शहादत दी। शहादत की याद ताजा करने के लिए हर साल अजादाराने-हुसैन गम मनाते हैं। इसी सिलसिले में अंजुमन-ए-पंजतनी के जानिव इस शोला मातम का एनाकाद किया जाता है। तकरीबन एक दर्जन से भी ज्यादा लोगों ने इस आतशी मातम को अंजाम दिया। एक दर्जन से भी ज्यादा लोगों ने इस आतशी मातम को अंजाम दिया। एक-एक कर और कई-कई बार यह सिलसिला देर तक बदस्तूर चलता रहा। तमाम जायरीनों के साथ नकाबपोश ख्बातीनें अश्कवार और जार-जार रो रही थीं। देर तक चीखने, रोने और सिसकियों की आवाजें रात के सन्नाटे में फिजां में तैर रही थी। इसके पहले शहर की तमाम अंजमुनों ने नौहे पढ़े। कातर आवाजों में पढ़े गये नौहे लोगों को और भी गमजदा कर रहे थे। नौहा पढ़ने वाली अंजमुनों में अंजुमने-पंजतनी, अंजुमने-सज्जादिया, दस्त-ए- सज्जादिया, अंजुमने-हैदरी, अंजुमने-अब्बासिया, अंजुमने-हुसैनिया, अंजुमने-काशमियां सहित दीगर अंजुमनों की हिस्सेदारी थी। शोला मातम के दरम्यान इमाम हुसैन आली मुकाम की कुर्बानियां याद कर मातम मनने वालों की कसीर तादाद में शिरकत थी। बच्चे, बूढ़े और मदरे के अलावा बड़ी तादाद में औरतों ने भी हजरत इमाम हुसैन को अपने अश्कों से खिराज-ए-अकीदत पेश किया। शोला मातम के मौके पर मौलाना दिलदार खुम्मी ने जायरीनों को खिताब करते हुए फरमाया कि मैदाने-कबर्ला उस अजीम और बेमिसाल वाकए की यादगार है जिसमें इस्लाम की हिफाजत को जिन्दा और जाबदां रखने के लिए अपनी हस्ती को फना करने वाले हजरत इमाम हुसैन ने अपने साथियों और खानदान के साथ शहादत दी। हजरत हुसैन ने दीन की बुनियादी कद्रों और इंसानी जिंदगी के लिए रब्बानी तरीके जहद व अमल की हिफाजत और सच्चाई का इजहार फरमाने के लिए मैदाने-कबर्ला में जलबा अफरोज हुए। अपना और अपनी औलाद का खून देकर हक व सदाकत का वह सफ्हा रकम किया जिसकी कोई मिसाल न माजी में है और न मुस्तकबिल में मुमकिन होगी। न पेशानी पर शिकन न चेहरे पर दर्द

कई चेहरे में रविकिशन


रविकिशन के प्रशंसक अब एक ही फिल्म में रविकिशन के कई चेहरे देख पाएंगे। एन.सी. इंटरप्राइसेस के बैनर तले निर्माता चंदन सिंह और राइटर हैरी फर्नाडीस द्वारा बनी फिल्म है- ह्यरामपुर के लक्ष्मणह्ण, जिसमें रविकिशन कई चेहरे में दिखेंगे। इस फिल्म में कभी वह एक देहाती ग्रामीण के किरदार में, तो कभी नेवी आॅफीसर या फिर कभी एक सज्जन व्यक्ति के रूप में होंगे। इसके अलावा, फिल्म में रविकिशन और भी कई किरदार में दिखेंगे। प्रत्येक किरदार में उनके साथ अलग-अलग पांच हिरोइन भी काम कर रही हैं। इन सितारों में हैं- अक्षरा सिंह, संगीता तिवारी, गुंजन पंत, दिव्या द्विवे दी औ र अनारा गु प्ता। ह्यरामपुर के लक्ष्मणह्ण एक सस्पेंस थिल्रर फिल्म है। यह फिल्म 26 जनवरी को रिलीज हो रही है। रविकिशन का कहना है, दशर्कों के लिए यह एक फुल डांस मनोरंजक फिल्म है।



शनिवार, 22 जनवरी 2011


मिट्टी काटने के दौरान ग्रेनाइट पत्थर की प्राचीन विष्णु प्रतिमा मिली


मधवापुर (मधुबनी)। विगत 16 जनवरी को प्रखंड के सलेमपुर गांव के जिस बरही पोखर से मिट्टी काटने के दौरान ग्रेनाइट पत्थर की प्राचीन विष्णु प्रतिमा मिली थी, बुधवार को उसी पोखर से मिट्टी काटने के दौरान गणेश प्रतिमा मिली है। सलेमपुर गांव स्थित सूखे पड़े बरही पोखर से कुछ ग्रामीणों द्वारा गृह निर्माण के लिए बुधवार को मिट्टी काटने के दौरान करीब 40 किलो वजन की ग्रेनाइट पत्थर से बनी गणेश प्रतिमा मिली। प्रतिमा की लंबाई दो फीट और चौड़ाई करीब डेढ़ फीट है। प्रतिमा के किनारों पर हनुमान भगवान की दो, लक्ष्मी-सरस्वती की एक-एक तथा गणेश वाहन चूहे की एक आकृति उभरी हुई है। तीन दिन में ही दूसरी बार प्रतिमा मिलने की सूचना से ग्रामीणों की भारी-भीड़ उक्त पोखर पर उमड़ पड़ी तथा लोग भगवान गणेश की जयकारा लगाते हुए प्रतिमा को गांव स्थित रामजानकी मंदिर में रखा गया। जहां क्षेत्र के लोगों की भारी भीड़ दर्शन के लिए पहुंच रही हैं। बताते चले कि विगत 16 जनवरी को इसी पोखर से मिट्टी काटने के दौरान दो क्विंटल की भगवान विष्णु की प्रतिमा मिली थी। जिसे राम मंदिर में पूजा अचर्ना के लिए रखा गया है। इधर, मंदिर निर्माण समिति के लोगों ने जिलाधिकारी एवं पर्यटन मंत्री बिहार से बार-बार गांव के पोखरे में देवताओं की प्रतिमा मिलने से पूर्व में यहां कोई मंदिर होने की संभावना व्यक्त करते हुए यहां उत्खनन की आवश्यकता जताई है।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

हर धर्म की माता गाय

गाय हमारी माता है, जन जन से उसका नाता हैं।
किसी जाति नहीं, धर्म नहीं हर कौम से उसका रिश्ता हैं।
गाय ने हम सबको वह पिटारा दिया हैँं।
जो क•ाी नहीं खाली होता उससे मानव जीवन संवरता हैं।
इतना ही नही श्रम के साथी बैलों को •ाी यही जन्म दिया हैं।
अमीर-गरीब रुपी रथ बैलों से सारा जग खुशहाल किया है।
इतनी सारी उपकारिता होते गाय फिर क्यों काटा जाता है।
इसे केवल पशु न समझो गाय ने मानव जीनव को नव रुप प्रदान किया है।
हिन्दु-मुस्लिम सिक्ख ईसाई स•ाी आगे बढकर आओ रे •ााई।
घर-घर जाकर अखल जगाकर गौ की रक्षा करो रे •ााई।
अब मानसिकता बदलकर गाय नहीं कटने देंगे रे •ााई।
•ाारतीय संस्कृति के गौरव को क•ाी चटकने नहीं देंगे रे •ााई।
माँ •ाारती के चरणों को नमन करो हमें शाक्ति देगी रे •ााई।
गो वंश, गो संवर्धन कर बसुधा की लाज रखेंगे रे •ााई।
रचियता
गोवर्धन पाणिग्राही

बिहार, छत्तीसगढ़ को फिर नहीं मिली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जगह

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में बुधवार को विस्तार और फेरबदल के बाद •ाी कुछ राज्य केन्द्र सरकार में प्रतिनिधित्व से अछूते बने हुए हैं। ऐसे राज्यों में प्रमुख रूप से बिहार, छत्तीसगढ़ और गोवा शामिल हैं। पूर्वोत्तर से असम और मेघालय को छोड़कर शेष राज्यों का सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं है। बुधवार को हुए फेरबदल में केवल तीन नये नाम मंत्रिमंडल में शामिल हुए हैं। इनमें उत्तर प्रदेश से बेनी प्रसाद वर्मा को इस्पात राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्र•ाार बनाया गया है। पंजाब से राज्यस•ाा सदस्य अश्विनी कुमार तथा केरल से सांसद केसी वेणुगोपाल राज्यमंत्री होंगे। इस तरह दो बड़े राज्य बिहार और छत्तीसगढ़ के अलावा गोवा तथा पूर्तोत्तर के अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा सत्ता से दूर बने हुए हैं। हालांकि बिहार में सत्तारूढ़ कांग्रेस के केवल दो सांसद हैं जिनमें से सासाराम से सांसद मीरा कुमार लोकस•ाा अध्यक्ष हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में •ाी केवल चरण दास महंत ही सत्तारूढ़ पार्टी के नुमांइदे हैं लेकिन इस बार की फेरबदल में महंत को शामिल नहीं किया गया है। गोवा में •ाी कुल दो सांसदों में से एक कांग्रेस से है। अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में स•ाी दो-दो सांसद और मिजोरम में एक प्रतिनिधि कांग्रेस के ही हैं लेकिन अ•ाी कोई सरकार में नहीं पहुंचा है।

अब हमेशा के लिए कर लो अपना नंबर मुट्ठी में

अगर दफ्तर में दाखिल होते ही आपके फोन के सिग्नल गायब हो जाते हैं या दोस्त हमेशा फोन आउट आॅफ रीच होने की शिकायत करते हैं तो अब आपको उनकी शिकायतों को अनसुना करने की जरूरत नहीं। गुरुवार से मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) शुरू हो रही है। यानी आपको बिना नंबर बदले मोबाइल सर्विस प्रवाइडर बदलने की आजादी मिलने जा रही है। वक्त आ गया है कि जो सेल्युलर कंपनियां अब तक आपकी शिकायतों पर ध्यान नहीं दे रही थीं, उन्हें अब आप सर्विस बदलकर रास्ता दिखाएं।
शुरुआत के तौर पर एमएनपी की सुविधा सबसे पहले पिछले साल नवंबर में हरियाणा के कुछ इलाकों में लागू की गई थी, पर गुरुवार से प्रधानमंत्री देश •ार में इसे लॉन्च कर देंगे। टेलिकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल के मुताबिक, इससे बड़ा फायदा यह होगा कि अगर आप अपने सर्विस प्रवाइडर से खुश नहीं हैं तो नंबर के बारे में डरे बिना आप दूसरे सर्विस प्रवाइडर की सेवा ले सकते हैं। लॉन्च से पहले ही सेल्युलर कंपनियां तरह-तरह से यूजर्स को लु•ााने लगी हैं और कई ने टोल-फ्री लाइनें •ाी शुरू कर दी हैं। इनमें लोगों को बिना नंबर बदले सर्विस बदलने के बारे में बताया जा रहा है।
19 रुपये में आजादी: एमएनपी के तहत आप मोबाइल नंबर बदले बगैर सर्विस प्रवाइडर बदल सकते हैं। आपका सेल नंबर नए सर्विस प्रवाइडर के पास पहुंच जाएगा। यह प्रक्रिया पूरी होने में सात दिन का वक्त लगेगा। अगर आप जीएसएम टू जीएसएम, सीडीएमए टू जीएसएम या फिर कोई दूसरा कनेक्शन यूज कर रहे हैं, तब •ाी आप इस सर्विस का फायदा उठा सकते हैं। इस सुविधा के लिए आपको नए सर्विस प्रवाइडर को महज 19 रुपये देने होंगे।
एक एसएमएस कर देगा काम: एमएनपी के लिए आपको 1900 पर एसएमएस •ोजना होगा। इसका फॉर्मेट होगा - ' ढडफळ <स्पेस> आपका मोबाइल नंबर'। बदले में आपको 8 नंबरों का कोड और उसकी एक्सपायरी डेट मिलेगी। इस कोड को यूनीक पोर्टिंग कोड (यूपीसी) कहा जाता है। अब आपको कोड, अड्रेस प्रूफ, आइडेंटिटी प्रूफ, फोटोग्राफ, यूपीसी और मोबाइल नंबर के जिक्र वाले ऐप्लिकेशन फॉर्म के साथ नए सर्विस प्रवाइडर के नजदीकी सर्विस सेंटर पर जाना होगा। यह काम आपको यूपीसी एसएमएस में आई एक्सपायरी डेट के •ाीतर करना होगा।
इसके बाद आॅपरेटर आपकी गुजारिश को मोबाइल पोर्टेबिलिटी क्लियरिंग हाउस तक पहुंचाएगा। वहां आपके नंबर को मौजूदा प्रवाइडर से डी-ऐक्टिवेट कर नए सर्विस प्रवाइडर से एक्टिवेट कर दिया जाएगा। ऐसा होने पर आपको नए प्रवाइडर से एसएमएस मिलेगा। इसमें उस तारीख और वक्त का जिक्र होगा, जिस दौरान आपका मोबाइल फोन नो सर्विस पीरियड (काम नहीं करेगा) में होगा। इसी दरम्यान सर्विस प्रवाइडर में तब्दीली होगा। इस प्रक्रिया में दो घंटे लगेंगे और तब तक आप मोबाइल फोन यूज नहीं कर सकेंगे। ये पीरियड रात बारह से सुबह पांच बजे के बीच होगा।
चाहे प्री हो या पोस्ट: एमएनपी को पोस्टपेड या प्रीपेड, दोनों नंबरों के लिए यूज कर सकते हैं। हां, पोस्टपेड कनेक्शन के मामले में कोई बकाया नहीं होना चाहिए। वहीं, प्रीपेड कनेक्शन के केस में आप अपना बैलेंस नए सर्विस प्रवाइडर को ट्रांसफर नहीं कर सकेंगे। इसे इंटरनेट डेटा कार्ड के तौर पर इस्तेमाल किए गए सिम कार्ड पर •ाी यूज किया जा सकेगा।

ओबामा के दौरे से •ाारत को •ाी फायदा

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा •ाारत के तीन दिवसीय पर आए हैं। वहीं यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल मीट में अमेरिका राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि •ाारत व्यापार प्रतिबंध हटाए तो बदले में अमेरिका •ाी ऐसा ही करेगा। •ाारत दौरे से पहले ही अमेरिका में पहले ही ओबामा ने कह दिया था कि •ाारत की ओर से आयात करने के नियमों में ढील मिलेगी, तो बदले में अमेरिका डीआरडीओ और इसरो जैसे संगठनों के लिए दोहरे काम में इस्तेमाल हो सकने वाली टेक्नॉलजी के निर्यात पर से रोक हटा सकता है। उन्होंने क हा कि मेरे •ाारत पहुंचने से ठीक पहले कई डील फाइनल हुई हैं।
पहले ही कायर्काल में •ाारत •ा्रमण किए
बीजेएमसी के स्टूडेंट दीपक श्रीवास्तव का कहना है कि ओबामा की तीन दिवसीय •ाारत यात्रा से दोनों देशों को कुछ न कुछ फायदे होंगे। वही अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अपने पहले ही कायर्काल में •ाारत का •ा्रमण किया, तो बात •ाी उल्लेखनीय है। उनकी इस यात्रा से शैक्षणिक, स्वास्थ्य, टेक्नालाजी और औद्योगिक क्षेत्रों में कई नए अवसर मिलेंगे और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में इससे मदद मिलेगी।
बेरोजगारों को मिलेगी नौकरी की सौगात
महंत कालेज के प्रिंसिपल देवाशीष मुखर्जी का कहना है कि •ाारत आकर अमेरिकी बिजनेसमैन का शुरुआत बहुत ही फायदे होगी। वहीं •ाारत में बाहर के मल्टीप्लैक्स कंपनियों के आने से •ाारत के •ाी बेरोजगारों को नौकरियां मिल पाएगी। मेरा मानना है कि ओबामा के •ाारत आने से अमेरिका के 50 हजार युवाओं को को नौकरी मिलेगी तो •ाारत के लोगों को •ाी इससे रोजगार में फायदा मिलेगा। वहीं यहां पर मल्टीप्लैक्स कंपनियों के आने से कुछ न कुछ फ र्क जरूर पड़ेगा।
दोनों देशों के नौकरी की सौगात
उद्योग महासंघ के अध्यक्ष महेश कक्कड़ का कहना है कि ओबामा के आने से 50 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। मगर अप्रत्यक्ष रूप से जो •ाी काम करेंगे, उनको •ाी रोजगार मिल सकेगा। अमेरिकी व्यवसाय शुरू होने से दोनों देशों के लोगों को रोजगार मिल सकेंगे।

बुधवार, 19 जनवरी 2011

मथुरा में अश्लील फिल्म बनाता था बाबा

मथुरा के घाटों और मंदिरों का बैकग्राउंड लेकर अश्लील फिल्म बनानेवाला वृंदावन का विवादास्पद स्वामी भगवताचार्य उर्फ राजेंद्र आखिरकार पुलिस के गिरफ्त में आ ही गया। पुलिस ने उसको पत्नी के साथ गिरफ्तार कर लिया है। वह पिछले 10-12 दिनों से फरार था। पुलिस टीम ने गाजियाबाद में स्वामी के रिश्तेदार के घर से अश्लील सीडी और कैमरे बरामद किए हैं।
मथुरा जिले में महीने भर पहले स्वामी राजेंद्र के अश्लील फिल्मों के निर्माण में शामिल होने पर काफी हंगामा मचा था। कई संगठनों ने राजेंद्र के पुतले जलाए थे और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। राजेंद्र पर घाटों , मंदिरों और यमुना नदी का बैकग्राउंड लेकर अश्लील फिल्में बनाने का आरोप है। पुलिस का कहना है कि स्वामी राजेंद्र प्रवचन करता था और अपने विदेशी शिष्यों के लिए अश्लील फिल्में बनाता था। स्वामी पर आईपीसी की धारा 377 और आईटी एक्ट की धारा 67 बी के तहत मामला दर्ज किया गया है।
मामले के जांच अधिकारी ने बताया कि कुछ फिल्मों में राजेंद्र अप्राकृतिक सेक्स में शामिल है और कुछ फिल्मों में छोटे बच्चों के साथ गलत हरकतें की गई हैं। चूंकि ये दोनों संज्ञेय अपराध है , इसलिए दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

वहीं आरोपी स्वामी का कहना है कि वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए इस तरह की फिल्में और क्लिप्स बनाता था , जिसे कुछ लोगों ने चुरा लिया और बाद में उसका बेजा इस्तेमाल किया। आरोपी का कहना है कि उस पर लगाए गए सारे आरोप निराधार है और सीडी से छेड़छाड़ की गई है।

इससे पहले स्वामी की पत्नी ने एक आईटी फर्म को अपना लैपटॉप मरम्मत के लिए दिया था। उसकी पत्नी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्होंने अपना खराब लैपटॉप मथुरा की बी साइबर वर्ल्ड नामक फर्म को मरम्मत के लिए दिया था , जिसमें उनके अपने पति के साथ कुछ फोटो थे , जिन्हें इन लोगों ने निकाल लिया। शिकायत के अनुसार फर्म ने फोटो न लीक करने के लिए ब्लैकमेलिंग के तौर पर 10 लाख रुपये मांगे और रकम न देने पर उन्हें सार्वजनिक कर दिया।
मथुरा के एसपी ( सिटी ) राम किशोर वर्मा ने कहा कि राजेंद्र और उनके परिजन गिरफ्तारी से बचने के लिए कानपुर , मथुरा और गाजियाबाद का रुख कर रहे थे। जांच अधिकारी विवेक त्रिपाठी ने स्वामी को उसकी पत्नी समेत गिरफ्तार कर लिया।

महंगाई ने की जेब ढिली

रायपुर
दिनों दिन बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की कमर तोड़ रखी है। इससे आम लोगों को काफी मुश्किलों का सामाना करना पड़ रहा है। शनिवार को पेट्रोल के दाम में एक बार फिर से 2.50 से 2.54 रूपए प्रति लीटर बढ़ा दिए गए। इससे पहले 15-16 दिसंबर को पेट्रोल की कीमतों में 2.96 रू पए की बढ़ोत्तरी की गई थी। कमर तोड़ मंहगाई पर लोगों का कहना है कि जिस तरह से पेट्रोल की कीमत में वृद्धि हो रही है उससे आम लोगों को काफी दिक्कतें हो रही है। लोगों का कहना है कि आमदनी तो वहीं की वहीं है, लेकिन खर्चा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है।
गाड़ी का यूज कम
लगातार पेट्रोल के दाम बढ़ने के कारण लोग गाड़ी का यूज कम कर रहे है। मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट रवि शुक्ला ने कहा कि जिस तरह से पेट्रोल के रेट बढ़ रहे हैं उससे लगता है कि अब गाड़ी को घर पर ही खड़ा करना पड़ेगा। कहीं भी जाने से पहले एक बार पेट्रोल का ख्याल जरूर आता है। रवि का कहना था कि दूर जाने के लिए गाड़ी तो जरूरी है, लेकिन आसपास के लिए अब पैदल ही काम चलाते हैं।
प्रयास करे सरकार
पुलिस लाइन निवासी रमेश मिश्रा का कहना है कि एक महीने में जिस तरह महंगाई ने अपने पैर पसारे हैं, उससे आम लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। खाने-पीने से लेकर सभी प्रकार के सामान की कीमत बढ़ती जा रही है। सरकार अगर चाहे तो महंगाई कम कर सकती है। पेट्रोल का रेट बढ़ने से सभी प्रकार के सामानों के रेट में भी बढ़ोत्तरी होगी।
पॉकेटमनी भी नहीं बचती
पेट्रोल की मार स्टूडेंट्स कि पॉकेटमनी पर भारी पड़ रही है। अवंति विहार निवासी एग्रीकल्चर स्टूडेंट दीपक सिंह ने बताया कि अब तो पॉकेटमनी पेट्रोल में खत्म हो जाती है। पहले तो पॉकेटमनी से बचाकर बाहर चाय नाश्ते में खर्च कर लेते थे, लेकिन अब इसके लिए भी सोचना पड़ेगा।
परिवहन लागत में होगी वृद्धि
पेट्रोल के दाम बढ़ने से परिवहन लागत में बढ़ोत्तरी होगी। परिवहन लागत का असर खाने पीने के सामानों पर भी पड़ेगा। पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का हर्जाना लोगों को सभी चीजों में भरना पड़ेगा।
डॉ. जेएन भारद्वाज, विभागाध्यक्ष अथर्शास्त्र विभाग रविवि

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