सोमवार, 13 जनवरी 2014

बस्तर के सवाल-जवाब

बस्तर
बात तब की है, जब पूर्वी-पाकिस्तान से लगातार शरणार्थी भारत की ओर आ रहे थे और उन्हें बसाया जाना तत्कालीन राजनीति के समक्ष एक विकराल समस्या थी. क्या यह विवशता थी, बाध्यता अथवा किसी दूरददृष्टि का अभाव कि तत्कालीन राजनीति ने लगभग अस्सी हजार वर्गमील में फैले उस आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को इन शरणार्थियों की पूर्णकालिक बसाहट के लिये चुना, जो महानदी और गोदावरी के मध्य अवस्थित है और जहाँ विश्व की सबसे दुर्लभतम जनजातियाँ और अनन्यतम इतिहास संरक्षित था. इस विशाल क्षेत्र में अविभाजित मध्यप्रदेश का बस्तर संभाग, आन्ध्रप्रदेश के कुछ पूर्वी और पश्चिमी हिस्से तथा ओडिशा के जयपोर और कालाहाण्डी जिले सम्मिलित थे. आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापित आबादी के बसाहट की संकल्पना वर्ष 1956 में सर एस एन रामामूर्ति द्वारा की गयी थी, जो तत्कालीन योजना विभाग में परामर्शदाता थे. पश्चिम बंगाल को आगंतुक आबादी के विस्फोट से बचाने के लिये यह तात्कालिक तरीका बिना किसी सराहनीय योजना अथवा दूरदर्शिता के बनाया गया था. इतिहास की किताबें खंगाल लीजिये, तत्कालीन समाजसेवियों और विचारकों के इस सम्बन्ध में आलेख या आन्दोलन तलाशिये कि किसी तरह का विरोध इस भयावह कदम के विरुद्ध देखा गया? स्वतंत्र भारत ने अपने आदिवासी और वन क्षेत्रों को दण्डकारण्य परियोजना के द्वारा वह दशा और दिशा दे दी थी, जो एक वृहद क्षेत्र की संस्कृति, वहाँ की साम्य स्थिति, वहाँ के जंगलों, वहाँ के आदिवासियों के लिये व्यापक परिप्रेक्ष्य में बहुत कुछ बदल देने वाली सिद्ध हुई. यद्यपि इस पुनर्वास योजना के पीछे का तर्क दण्डकारण्य के आदिवासी क्षेत्रों का विकास था, जिसकी झलक आज खोजे नहीं मिलती. बस्तर के आदिवासी संदर्भों और जंगल को हमने जिस भी प्रशासकीय दृष्टिकोण से देखा है, उसमें व्यवहारिकता की बेहद कमी महसूस हुई है. विरोधाभास देखिये कि हमें एक अछूते और दुर्लभ वन क्षेत्र में ऐसी बसाहट की स्वीकृति प्रदान करने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई, जिसके पास न तो आजीविका थी, न रहने का ठिकाना. यह तय था कि वे जंगलों को काट कर खेत बनायेंगे, यह तय था कि वे वनोत्पादों पर दबाव पैदा करेंगे, यह तय था कि वे परम्परागत कृषि उत्पादों, वानिकी और बागवानी तक के मायने बदल देंगे और यह भी निश्चित ही था कि आदिम जीवन शैली पर भी इससे भयावह कुठाराघात होगा. अफसोस की बात ये है कि आज तक भी बस्तर पर हमने थोपने वाली दृष्टि रखी है. समय बदला, प्रशासक बदले, दृष्टिकोण बदला और जब बस्तर क्षेत्र में मुख्यधारा जैसी हवाओं के चलने का आभास हो रहा था तब फिर अबूझमाड़ को शेष दुनिया के लिये प्रतिबंधित घोषित कर एक नये तरह का विरोधाभास पैदा किया गया. हम जिस नक्सलवाद और जंगल के जनजातीय हक पर निरंतर चर्चा करते हैं संभवत: बस्तर में उसकी आधारशिला इसी प्रशासकीय निर्णय में छिपी है. क्या हम तय कर पाये हैं कि हमें विवस्त्र आदिवासी संरक्षित रखने हैं या उनके लिये किसी तरह का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण हमारे पास है? नीति-निर्धारकों को लगता है कि आदिवासी स्वयं के प्रति संवेदनशील नहीं, अपनी परम्परा के प्रति लापरवाह है और उन्हें अपने जंगलों की समझ या कद्र नहीं है. शायद इसीलिये किसी को उनके क्षेत्रों में मुख्यधारा ही बसा देनी है तो कोई ताला-चाबी ले कर सभ्यताओं के बीच के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर देने को आमदा है. बस्तर के संदर्भ में यह बात इतनी लचीली हो गयी है कि जल-जंगल और ज़मीन की लड़ाई को खालिस विचारधाराओं और बंदूक की जंग में उलझा भर दिया गया है लेकिन इन संदर्भों पर वास्तविकता में किसी के पास न कोई दृष्टिकोण है न ही समाधान. क्या अंतर आया है, आज को दृष्टिगत रखते हुए विवेचना कीजिये; संदर्भ 9 मार्च 1969 का है जब कोण्डागाँव से तत्कालीन विधायक मानकूराम सोढ़ी जो कि बाद में कई बार बस्तर लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी रहे हैं; उन्होंने भोपाल विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर बोलते हुए कहा था कि “एक्साईज को हमारे बस्तर से 63 लाख की आमदनी होती है. मैं जानना चाहता हूँ कि इसमे से कितनी राशि बस्तर के विकास के लिये मिलती है? बस्तर जिले को लोगों को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझ लिया है...... वन विभाग द्वारा जनता पर जो आरोप लगाया जा रहा है कि आदिवासी जंगल काट रहे हैं वह गलत है. यदि बस्तर के आदिवासियों में जंगल काटने की आदत होती तो आज वहाँ के जंगल भी साफ हो गये होते, जैसा कि धार और झाबुआ का हाल हुआ है. हमारे आदिवासी अपने जंगल को सम्पत्ति समझ कर उसकी रक्षा किये हुए हैं और इसी से आज शासन को पाँच करोड रुपये प्रतिवर्ष की आमदनी होती है.“ आर्थिक आंकडे आज के संदर्भ में कई गुणा अधिक हो गये हैं लेकिन परिस्थितियाँ जस की तस है. अर्थात जब हमें जरूरत हुई तो हमने विस्थापित बसा दिये, हमें जरूरत हुई तो अबूझमाडियों को मानव संग्रहालय की वस्तु बना दिया, हमें जरूरत हुई तो औने पौने दामों में तेन्दूपत्ते खरीदे, अपनी मर्जी की कीमत पर वनोत्पादों को हथियाया और साथ ही साथ ऐसे कानून भी बनाते गये जो जंगल पर ही आदिवासियों का वास्तविक हक न रहने दे. तो क्या आदिवासी ही नहीं जानते कि उन्हें अपने जंगल के साथ क्या और कैसा व्यवहार करना चाहिये? इस विषय का उत्तर भी इतिहास में ही छिपा है. मुख्यधारा के लोग चिपको आन्दोलन से परिचित हैं क्योंकि यह आज की पीढी की नजरो से गुजरा हुआ सच है किंतु कितने लोग जानते हैं कि जिन आदिवासियों पर हम पिछड़ा और विचारशून्य होने का लेबल चस्पा करते हैं, उन्होंने अठारहवीं सदी में चिपको से भी बड़ा पर्यावरण आन्दोलन खड़ा किया? बस्तर अर्थात नक्सलवादी जानने वाली आज की पीढी यदि यहाँ के अतीत के कुछ पन्ने पलटे तो चमत्कृत हो सकती है. कोई विद्रोह (1859) भारत के पहले ज्ञात पर्यावरण आन्दोलनों में से एक है जिसका सूत्रवाक्य था- ”एक पेड़ के बदले में एक सिर””. बस्तर में अंग्रेजों ने सागवान के जंगलो को काटने के लिये आरा मशीनें लगवा दी थी, जिसका ठेका निजाम हैदराबाद के लोगों को दिया गया था. अपने जंगल खो देने के अहसास ने आदिम समाज को एक जुट कर दिया. इस विद्रोह का सूत्रपात भेज्जी, फोतकेल तथा कोतापल्ली के आदिवासियों ने मिल कर किया था. यह तय किया गया कि अब जंगल और नहीं कटने दिये जायेंगे. माझियों ने एक राय हो कर फैसला किया कि “एक पेड़ के पीछे एक सिर होगा” और यही संदेश उन्होंने अपने राजा, अंग्रेज अधिकारियों और ठेकेदारों को भी भिजवा दिया. अंग्रेजों ने निर्देश जारी किये कि जंगल की कटाई करने वाले मजदूरों के साथ हथियारबंद सिपाही भेजे जायें. विद्रोही भी हथियार का जवाब हथियार से देने के लिये तैयार थे. अगली सुबह बंदूक के साये में आरा मशीनों की घरघराहट जैसे ही आरंभ हुई, विद्रोही अनियंत्रित हो गये.
- राजीव रंजन प्रसाद