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गुरुवार, 3 मार्च 2011

शिव के पौराणिक शिवालय....

यूँ तो प्रत्येक शहर और गाँवों में शिव के अनेकों शिवालय है, जिनमें से अधिकतर का अपना अलग पुरातात्विक और पौराणिक महत्व भी है। पुराणों में बारह ज्योर्तिलिंग के अलावा भी शिव के पवित्र स्थानों का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक स्थान से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं तथा इसका खगोलीय महत्व भी है। हम जानते हैं कि प्रमुख रूप से भगवान शिव के कौन-कौन से स्थान है।

कैलाश पर्वत : कैलाश पर्वत भगवान शिव का मुख्‍य निवास स्थान है। कैलाश पर्वत चीन के तिब्बती इलाके में है। पर्वत के नजदीक ही विश्व प्रसिद्ध मानसरोवर झील है जहाँ माँ पार्वती स्नान करती थी। पुराणों अनुसार उक्त स्थान के नीचे ही पाताल लोक है जहाँ भगवान विष्णु विराजमान है। कैलाश पर्वत के लाखों योजन ऊपर ब्रह्मा का स्थान माना गया है।

ज्योतिर्लिंग : ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएँ प्रचलित है। विक्रम संवत के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदि मानव को यह रुद्र का आविर्भाव दिखा। शिव पुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। यही उल्‍का पिंड बारह ज्‍योतिर्लिंग कहलाए।


12 ज्योतिर्लिंग :- (1) सोमनाथ, (2) मल्लिकार्जुन, (3) महाकालेश्वर, (4) ॐकारेश्वर, (5) वैद्यनाथ, (6) भीमशंकर, (7) रामेश्वर, (8) नागेश्वर, (9) विश्वनाथजी, (10) त्र्यम्बकेश्वर, (11) केदारनाथ, (12) घृष्णेश्वर

अमरनाथ : वैसे जो जम्मू और कश्मीर में सैकड़ों प्राचीन शिव मंदिर है और हिन्दू पंडितों द्वारा पलायन करने के बाद सैंकड़ों मंदिर तोड़ दिए गया है किंतु विश्व प्रसिद्ध अमरनाथ तीर्थ स्‍थल का ही ज्यादा महत्व है। यह वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। इस स्थान को अमरनाथ की गुफा कहा जाता है। स्थानीय लोग इसे ‘बर्फानी बाबा’ की गुफा के नाम से पुकारते हैं। गुफा श्रीनगर से उत्तर-पूर्व में 135 सहस्त्रमीटर दूर समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई 19 मीटर, चौड़ाई 16 मीटर और ऊँचाई 11 मीटर है।

अरुणाचलेश्वर मंदिर : यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है जो एक विशालकाय पर्वत पर स्थापित है। तिरुअन्नामलाई नामक कस्बे में स्थित यह मंदिर चेन्नई से 187 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर से जुड़ी कथा का शिव पुराण में उल्लेख मिलता है। भगवान शिव के पंचभूत क्षेत्रों में से एक अरुणाचलेश्वर मंदिर को अग्नि क्षेत्र माना जाता है जबकि काँची और तिरुवरुवर को पृथ्वी, चिदंबरम को आकाश, कलष्टी को वायु और तिरुवनिका को जल क्षेत्र माना जाता है।

श्रीकालहस्ती : आंध्रप्रदेश के तिरुपति शहर के पास पेन्नारजी की शाखा स्वर्णामुखी नदी के तट पर बसा कालहस्ती नामक स्थान पर भगवान शंकर का बहुत ही प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। दक्षिण भारत में स्थित भगवान शिव के तीर्थस्थानों में इस स्थान का विशेष महत्व है। नदी तट से पर्वत के तल तक विस्तारित इस स्थान को दक्षिण कैलाश व दक्षिण काशी नाम से भी जाना जाता है।

सिद्धनाथ महादेव : पाँडवों ने मालवा क्षेत्र में पाँच शिव मंदिर बनाएँ थे उनमें से एक है सिद्धनाथ महादेव का मंदिर। यह मंदिर पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे बसे नगर नेमावर में स्थित है। ऐसी किंवदंती भी है कि सिद्धनाथ मंदिर के शिवलिंग की स्थापना चार सिद्ध ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार ने सतयुग में की थी। इसी कारण इस मंदिर का नाम सिद्धनाथ है। हिंदू और जैन पुराणों में इस स्थान का कई बार उल्लेख हुआ है। इसे सब पापों का नाश कर सिद्धिदाता ‍तीर्थस्थल माना गया है।

कर्णेश्वर महादेव : मालवांचल में कौरवों-पांडवों ने अनेक मंदिर बनाएँ थे जिनमें से एक है सेंधल नदी के किनारे बसा यह कर्णेश्वर महादेव का मंदिर। करनावद (कर्णावत) नगर के राजा कर्ण यहाँ बैठकर ग्रामवासियों को दान दिया करते थे इस कारण इस मंदिर का नाम कर्णेश्वर मंदिर पड़ा। मध्यप्रदेश के इंदौर से 30 किलोमिटर पर स्थित देवास जिले में स्थित है करनावद ग्राम।

नटराज मंदिर चिदंबरम : तमिलनाडु में चिदंबरम का नटराज मंदिर चेन्नई-तंजावुर मार्ग पर चेन्नई से 245 किमी दूर स्थित है। पुराणों के मुताबिक भगवान यहाँ प्रणव मंत्र ‘ॐ’ के आकार में विराजमान हैं। भगवान शिव के पाँच क्षेत्रों में से एक है चिदंबरम। इसे शिव का आकाश क्षेत्र कहा जाता है। अन्य चार क्षेत्रों में कालाहस्ती (आंध्रप्रदेश) अर्थात वायु, कांचीपुरम यानी पृथ्वी, तिरुवनिका- जल और अरुणाचलेश्वर (तिरुवनामलाई) अर्थात अग्नि शामिल हैं। शिव के नटराज स्वरूप के नृत्य का स्वामी होने के कारण भरतनाट्यम के कलाकारों के लिए इस स्थान का खास महत्व है।

मंगलवार, 1 मार्च 2011

कृष्ण है सनातन पथ....


कृष्ण को ईश्वर मानना अनुचित है, किंतु इस धरती पर उनसे बड़ा कोई ईश्वर तुल्य नहीं है, इसीलिए उन्हें पूर्ण अवतार कहा गया है। कृष्ण ही गुरु और सखा हैं। कृष्ण ही भगवान है अन्य कोई भगवान नहीं। कृष्ण हैं राजनीति, धर्म, दर्शन और योग का पूर्ण वक्तव्य। कृष्ण को जानना और उन्हीं की भक्ति करना ही हिंदुत्व का भक्ति मार्ग है। अन्य की भक्ति सिर्फ भ्रम, भटकाव और निर्णयहीनता के मार्ग पर ले जाती है। भजगोविंदम मूढ़मते।

कृष्ण जन्म : पुराणों अनुसार आठवें अवतार के रूप में विष्णु ने यह अवतार आठवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5121 वर्ष पूर्व) को हुआ हुआ। ज्योतिषियों अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।

कृष्ण पर शोध : हाल ही में ब्रिटेन में रहने वाले शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं, पुरातात्विक तथ्यों आदि के आधार पर कृष्ण जन्म और महाभारत युद्ध के समय का सटिक वर्णन किया है। ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलिय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। उस वक्त भगवान कृष्ण 55-56 वर्ष के थे।

उन्होंने अपनी खोज के लिए टेनेसी के मेम्फिन यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. नरहरि अचर द्वारा 2004-05 में किए गए शोध का हवाला भी दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने पुरातात्विक तथ्यों को भी शामिल किया। जैसे कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के सबूत, पानी में डूबी द्वारका और वहाँ मिले कृष्ण-बलराम के की छवियों वाले पुरातात्विक सिक्के और मोहरे, ग्रीक राजा हेलिडोरस द्वारा कृष्ण को सम्मान देने के पुरातात्विक सबूत आदि।

महाभारत, गीता और कृष्ण के समय के संबंध में मेक्समूलर, बेबेर, लुडविग, हो-ज्मान, विंटरनिट्स फॉन श्राडर आदि सभी विदेशी विद्वानों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का कुछ भारतीय विद्वानों ने भी अनुसरण कर भ्रम के जाल को और बढ़ावा दिया है। भारत में ब्रह्माकुमारी जैसे मिशनों ने भी कृष्ण और महाभारत युद्ध की ऐतिहासिकता के संबंध में भ्रम फैला रखा है। उक्त की बातों को जोरदार तरीके से खंडन कर कृष्ण पर समग्र शोध किए जाने की आवश्यकता है।

दयानंद सरस्वती ने विदेशी विद्वानों की बातों का खंडन कर अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में एक लेख लिखा था जिसमें युद्धिष्ठिर से लेकर अंतिम हिंदू राजा यशपाल तक के नाम दिए है। यशपाल को शाहबुद्दीन ने पराजित कर दिल्ली पर अपना आधिपत्य कायम किया था।

कृष्ण जीवन : श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि महाभारत में वर्णित है वही इतिहास सिद्ध है बाकी सभी विस्तार, अलंकार और श्रृंगार की बातें हैं। वेदों के गोपी, गोपि‍का और रास का गलत अर्थ निकाले जाने के कारण भागवत और ब्रह्मवैवर्त सहित अन्य पुराणों में उनके जीवन चरित्र को श्रृंगारिक रूप दिया गया है। श्रीकृष्ण ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं, जो अपने कर्मों से मनुष्य से भगवान या महामानव हो गए न कि ईश्वर। न वे सृष्टि रचयिता हैं और न ही सृष्टिपालक। वे तो महामानव हैं।

श्रीकृष्ण शिक्षा-दीक्षा : योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदिपनी के आश्रम में रह कर हासिल की थी। वह योग में पारगत थे तथा योग द्वारा जो भी सिद्धियाँ होती है वह स्वत: ही उन्हें प्राप्य थी। सिद्धियों से पार भी जगत है वह उस जगत की चर्चा गीता में करते हैं। गीता मानती है कि चमत्कार धर्म नहीं है। स्थितप्रज्ञ हो जाना ही धर्म है।


महाभारत के कृष्ण

कृष्ण लीलाएँ : कृष्ण के जीवन में बहुत रोचकता और उथल-पुथल रही है। बाल्यकाल में वे दुनिया के सर्वाधिक नटखट बालक रहे, तो किशोर अवस्था में गोपियों के साथ पनघट पर नृत्य करना और बाँसुरी बजाना उनके जीवन का सबसे रोचक प्रसंग है। कुछ और बड़े हुए तो मथुरा में कंस का वध कर प्रजा को अत्याचारी राजा कंस से मुक्त करने के उपरांत कृष्ण ने अपने माता-पिता को भी कारागार से मुक्त कराया। इसके अलावा कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय-दमन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ट आदि राक्षसों का संहार किया था। श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। और उनमें सभी तरह की शक्तियाँ थी।

कृष्ण पत्नी और प्रेमिका : कृष्ण को चाहने वाली अनेकों गोपियाँ और प्रेमिकाएँ थी। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रांगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता।

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्णकी विवाहिता पत्नियाँ हैं। राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएँ थी। उक्त सभी को सखियाँ भी कहा जाता है। राधा की कुछ सखियाँ भी कृष्ण से प्रेम करती थी जिनके नाम निम्न है:- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी हैं। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएँ थी जिनके नाम इस तरह है:- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा।

कर्म योगी कृष्ण : गीता में कर्म योग का बहुत महत्व है। गीता में कर्म बंधन से मुक्ति के साधन बताएँ हैं। कर्मों से मुक्ति नहीं, कर्मों के जो बंधन है उससे मुक्ति। कर्म बंधन अर्थात हम जो भी कर्म करते हैं उससे जो शरीर और मन पर प्रभाव पड़ता है उस प्रभाव के बंधन से मुक्ति आवश्यक है।

कृष्ण ने जो भी कार्य किया उसे अपना कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण जीते थे और पूरी जिम्मेदारी के साथ उसका पालन करते थे। न अतीत में और न भविष्य में, जहाँ हैं वहीं पूरी सघनता से जीना ही उनका उद्देश्य रहा।

कृष्ण निवास : गोकुल, वृंदावन और द्वारिका में कृष्ण ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण क्षण गुजारे। पूरे भारतवर्ष में कृष्ण अनेकों स्थान पर गए। वे जहाँ-जहाँ भी गए उक्त स्थान से जुड़ी उनकी गाथाएँ प्रचलित है लेकिन मथुरा उनकी जन्मभूमि होने के कारण हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है।

महाभारत का युद्ध : कौरवों और पांडवों के बीच हस्तिनापुर की गद्दी के लिए कुरुक्षेत्र में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध हुआ था। कुरुक्षेत्र हरियाणा प्रान्त का एक जिला है। मान्यता है कि यहीं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

कृष्ण इस युद्ध में पांडवों के साथ थे। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। नवीनतम शोधानुसार यह युद्ध 3067 ई. पूर्व हुआ था। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी। तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है।

कृष्ण जन्म और मृत्यु के समय ग्रह-नक्षत्रों की जो स्थिति थी उस आधार पर ज्योतिषियों अनुसार कृष्ण की आयु 119-33 वर्ष आँकी गई है। उनकी मृत्यु एक बहेलिए के तीर के लगने से हुई थी।

गीता प्रवचन : कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो उपदेश दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों के सार को गीता कहा गया है। ऋषि वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता थे। गीता महाभारत के भीष्मपर्व का हिस्सा है।

स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि युद्ध क्षेत्र में जो ज्ञान मैंने तुझे दिया था उस वक्त मैं योगयुक्त था। अत: उस अवस्था में परमात्मा की बात कहते हुए, वह परमात्मा के प्रतिनिधि बनते हुए परमात्मा के लिए मैं, मेरा, मुझे इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हैं इससे यह आशय नहीं कि वे खुद परमात्मा हैं या उनमें किसी प्रकार का अहंकार है।

द्वारिका निर्माण : कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने गुजरात के समुद्र के तट पर द्वारिका का निर्माण कराया और वहाँ एक नए राज्य की स्थापना की। कालांतर में यह नगरी समुद्र में डूब गई, जिसके कुछ अवशेष अभी हाल में ही खोजे गए हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदापीठ भी यहीं पर स्थित है। हिंदुओं को चार धामों में से एक द्वारिका धाम को द्वारिकापुरी मोक्ष तीर्थ कहा जाता है। स्कंदपुराण में श्रीद्वारिका महात्म्य का वर्णन मिलता है।

जैन धर्म : जैन धर्म के २२वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान जो कृष्ण के चचेरे भाई थे, कृष्ण इनके पास बैठकर इनके प्रवचन सुना करते थे। जैन धर्म ने कृष्ण को उनके त्रैषठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो बारह नारायणों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि अगली चौबीसी में कृष्ण जैनियों के प्रथम तीर्थंकर होंगे।

”उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।”-कृष्ण...

राम हैं भारत की आत्मा....


राम’ यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है जो हमें आत्मिक शांति देती है।

राम ने 14 वर्ष वन में रहकर भारतभर में भ्रमण कर भारतीय आदिवासी, जनजाति, पहाड़ी और समुद्री लोगों के बीच सत्य, प्रेम, मर्यादा और सेवा का संदेश फैलाया। यही कारण रहा की राम का जब रावण से युद्ध हुआ तो सभी तरह की अनार्य जातियों ने राम का साथ दिया। यह वह काल था जबकि लोगों में किसी भी प्रकार की जातिवादी सोच नहीं थी। लोग सिर्फ दो तरह की सोच में ही बँटे थे- यक्ष और रक्ष जिसे सूर और असुर या देव और दानव कहा जाता था।

जन्म: राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से 7122 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। अन्य विशेषज्ञों अनुसार राम का जन्म आज से लगभग 9,000 वर्ष (7323 ईसा पूर्व) हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है।

राम का परिचय : अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र थे भगवान राम। दशरथ की तीन पत्नीयाँ थी- कौशल्या, सुमीत्रा और कैकयी। राम के तीन भाई थे। लक्ष्मण, भरत और शत्रुध्न। राम कौशल्या के पुत्र थे। सुमीत्रा के लक्ष्मण और शत्रुध्न दो पुत्र थे। कैकयी के पुत्र का नाम भरत था।

लक्ष्मण की पत्नी का नाम उर्मिला, शत्रुध्न की पत्नी का नाम श्रुतकीर्ति और भरत की पत्नी का नाम मांडवी था। सीता और उर्मिला राजा जनक की पुत्रियाँ थी और मांडवी और श्रुत‍कीर्ति कुशध्वज की पुत्रियाँ थी। लक्ष्मण के अंगद तथा चंद्रकेतु नामक दो पुत्र थे।

राम का विवाह मिथिला के नरेश राजा जनक की पुत्री सीता से हुआ। सीता स्वयंवर में रावण भी आया था। विवाह बाद कैकयी के कहने पर राम को दशरथ ने 14 वर्ष के वनवास में भेज दिया। वनवास में सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ गए। इधर कैकयी ने भारत को अयोध्या का राजा बना दिया।

वनवास के दौरान लक्ष्मण ने रावण की बहिन सूर्पणखा की नाक काट दी थी। सीता स्वयंवर में अपनी हार और सूरपर्णखा की नाक काटने का बदला लेने के लिए रावण ने सीता का हरण कर लिया। वनवास के दौरान ही राम को सीता से दो पुत्र प्राप्त हुए- लव और कुश। एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए ‍जो महाभारत युद्ध में कोरवों की ओर से लड़े थे।

राम ने सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए संपाति, हनुमान, सुग्रीव, विभिषण, मैन्द, द्विविद, जाम्बवंत, नल, नील, तार, अंगद, धूम्र, सुषेण, केसरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन (गवाक्ष), दधिमुख, गवय और गन्धमादन आदि की सहायता से सेतु बनाया और लंका पर चढ़ाई कर दी। लंका में घोर युद्ध हुआ और पराक्रमी रावण का वध हो गया। तब पुष्पक विमान द्वारा रावण सीता सहित पुन: अयोध्या आ गए।

इस सारे घटनाक्रम में हनुमानजी ने राम का बहुत साथ दिया इसीलिए हनुमानजी राम के अनन्य सहायक और भक्त सिद्ध हुए। भगवान राम को हनुमान ऋष्यमूक पर्वत के पास मिले थे।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम: गुरु वशिष्ठ से शिक्षा-दिक्षा लेना, विश्वामित्र के साथ वन में ऋषियों के यज्ञ की रक्षा करना और राक्षसों का वध, राम स्वयंवर, शिव का धनुष तोड़ना, वनवास, केवट से मिलन, लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा (वज्रमणि) की नाक काटना, खर और दूषण का वध, लक्ष्मण द्वारा लक्ष्मण रेखा खींचना, स्वर्ण हिरण-मारीच का वध, सीता हरण, जटायु से मिलन।

कबन्ध का वध, शबरी से मिलन, हनुमानजी से मिलन, सुग्रीव से मिलन, दुन्दुभि और बाली का वध, संपाति द्वारा सीता का पता बताना, अशोक वाटिका में हनुमान द्वारा सीता को राम की अँगुठी देना, हनुमान द्वारा लंका दहन, सेतु का निर्माण, लंका में रावण से युद्ध, लक्ष्मण का मुर्छित होना, हनुमान द्वारा संजीवनी लाना और रावण का वध, पुष्पक विमान से अयोध्या आगमन।

रामायण : रामायण को वा‍ल्मीकि ने राम के काल में ही लिखा था। इसीलिए इस ग्रंथ को सबसे प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। रामायण और महाभारत यही ग्रंथ मूलत: हिंदू इतिहास की प्रमाणिक जानकारी देते हैं। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है।

रामचरित मानस : रामचरित मानस को गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा जिनका जन्म संवत्‌ 1554 को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधि भाषा में की। रामायण से अधिक इस ग्रंथ की लोकप्रियता है।

अन्य भारतीय रामायण : तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि भारतीय भाषाओं में प्राचीनकाल में ही रामायण लिखी गई।

विदेशी रामायण : कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलयेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलीत है। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहाँ की भाषा में रामायण लिखी गई है।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

हर धर्म की माता गाय

गाय हमारी माता है, जन जन से उसका नाता हैं।
किसी जाति नहीं, धर्म नहीं हर कौम से उसका रिश्ता हैं।
गाय ने हम सबको वह पिटारा दिया हैँं।
जो क•ाी नहीं खाली होता उससे मानव जीवन संवरता हैं।
इतना ही नही श्रम के साथी बैलों को •ाी यही जन्म दिया हैं।
अमीर-गरीब रुपी रथ बैलों से सारा जग खुशहाल किया है।
इतनी सारी उपकारिता होते गाय फिर क्यों काटा जाता है।
इसे केवल पशु न समझो गाय ने मानव जीनव को नव रुप प्रदान किया है।
हिन्दु-मुस्लिम सिक्ख ईसाई स•ाी आगे बढकर आओ रे •ााई।
घर-घर जाकर अखल जगाकर गौ की रक्षा करो रे •ााई।
अब मानसिकता बदलकर गाय नहीं कटने देंगे रे •ााई।
•ाारतीय संस्कृति के गौरव को क•ाी चटकने नहीं देंगे रे •ााई।
माँ •ाारती के चरणों को नमन करो हमें शाक्ति देगी रे •ााई।
गो वंश, गो संवर्धन कर बसुधा की लाज रखेंगे रे •ााई।
रचियता
गोवर्धन पाणिग्राही