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शनिवार, 17 मार्च 2012

काफी उम्मीदें अखिलेश भईया से

अभी तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हैं। उत्तर प्रदेश की जनता को उनके उपर पूरा विश्वास है कि वह यूपी के खराब छवि के साथ महिलाएं व लड़कियों के साथ होने वाले अत्याचार और अनाचार को खत्म कर देंगे। जब अखिलेश चुनावी मैदान में उतरे थे, तभी जनता ने फेसला ले लिया था कि अब की बार माया दीदी को नहीं, बल्कि अखिलेश भईया को प्रदेश की कमान देनी हैं। अभी तक तो जितने भी नेता आएं वह अपना कोई खास छवि नहीं छोड़ पाएं, लेकिन युवा नेता अखिलेश भईया से काफी उम्मीदे हैं। वैसे भी अभी तक कोई खास नेता के हाथ प्रदेश की कमान नहीं थी, लेकिन इस तस्वीर में अखिलेश भईया को एक नजर में जन सकते है

सोमवार, 12 मार्च 2012

नहीं बनना चाहेगा कोई आईपीस अधिकारी

पिछले दिनों मुरेना के जबाज ऑफिसर नरेन्द्र कुमार को खनिज माफियों ने मोत के घाट उतार दिया....मोत की स्थिति को देख कर नहीं लगता है कि किसी ने मारा होगा... लेकिन खनिज माफियों ने अपनी खुनस निखालने के लिए ट्रक से कुचल कार मर डाला... ऑफिसर होने के कारण बात आमलोगों तक जल्दी पहुँच गई... नहीं तो भनक तक नहीं लगने देते खनिज माफिया वाले.... ऑफिसर के मोत पर राजनेता कोई सपोर्ट नहीं कर रहे है, बल्कि उल्टा उनके परिवार वालों को फ़िल्मी डाइलोग मर रहे है.... एक मंत्री ने कहा कि मप्र कि सरकार हाथ में चुरी नहीं पहनी है.... उलटे सीधे ब्यान देना बंद नहीं किए... तो उसका भुगतान भरना पर जायेगा.... राजनेता के बयां से साफ जाहिर होता है कि खनिज माफिया और मप्र के राजनेताओं में कितनी संठ गांठ है... वेसे मप्र और छग दोनों सरकार खुद को भाई भाई मानते है.... वेसा ही देखने को भी मिला... मप में जन्वाज ऑफिसर के मरने के बाद छग के बिलासपुर के एसपी राहुल शर्मा ने भी खुद को अपने रिवाल्वर से गोली मार ली.... इन दिनों क्या हो गया कि आईपीस रेंक के अधिकारी खुद को गोली मर रहे है.... अधिकारीयों के मरने से साफ जाहिर होता है कि प्रदेश की सरकार निकामा है.... अगर एसे ही राजनेता खनिज माफियाओं से संठ गांठ करते रहे तो कोई भी आईपीस बनना नहीं चाहेगा.... आईपीस की छबि को सही करने के लिए सरकार को खुद के दूतों को सही रस्ते पर लेन की जरुरत है...

सोमवार, 9 जनवरी 2012

सामली गाँव से मॉडलिंग रैम्प तक

राजेश जोशी
सफ़ेद सेक्सी लिबास में ख़ूबसूरत, लंबी और छरहरी वो लड़की एक उतनी ही आलीशान कार के पास खड़ी थी. आत्मविश्वास से भरी मुस्कान बिखेरते हुए वो कार देखने आ रहे लोगों का स्वागत कर रही थी. उसमें और वहाँ मौजूद दूसरी मौजूद लड़कियों में बहुत फ़कऱ् नहीं था, सिफर् इस बात के कि ये लड़की उत्तर प्रदेश में मुजफ़्फ़ऱनगर क़स्बे के पास सामली गाँव की रहने वाली है. मीनाक्षी बालियान ने गाँव में ही रहकर पढ़ाई की और वहीं से मॉडलिंग की दुनिया में प्रवेश किया. वो बताती हैं कि उनके पिता किसान हैं और अब भी खेती करते हैं और उन्हें मीनाक्षी के मॉडलिंग करने पर कोई ऐतराज़ नहीं है. दिल्ली के कार मेले में महँगी देसी-विदेशी कारों के साथ-साथ मीनाक्षी जैसी कई ख़ूबसूरत भारतीय और विदेशी मॉड़ल लड़कियाँ भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं. आत्मविश्वास से भरी, फर्ऱाटेदार अँग्रेज़ी बोलने वाली इन मॉडलों में भारत के अलावा रूस, ऑस्ट्रेलिया और कई दूसरे देशों की लड़कियाँ भी हैं. फिर भी लंबी, छरहरी मीनाक्षी में कुछ ऐसा था कि मैं बेसाख़्ता उनके पास चला गया और अँग्रेज़ी में पूछा - आप कितनी देर से यहाँ खड़ी हैं? मीनाक्षी कहती हैं कि मॉडलिंग के करियर में वो कोई भी तरीक़ा अपना कर आगे नहीं बढऩा चाहतीं. पहले कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद उसने मुस्कुरा कर हिंदी में जवाब दिया -- एक घंटा. जब चारों ओर करोड़ों की आलीशान कारों की नुमाइश लगी हो, जिन्हें देखने
के लिए रतन टाटा जैसे उद्योगपति, इरफ़ान पठान जैसे क्रिकेट खिलाड़ी और कटरीना कैफ़ जैसी स्टार पहुँची हुई हों तो एक ग्लैमरस मॉडल से अँग्रेज़ी में पूछे गए सवाल का जवाब हिंदी में सुनना आपको अचकचा देता है.
मेरी दिलचस्पी बढ़ी तो मैंने बातचीत भी आगे बढ़ाई. प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:


आप कब से मॉडलिंग में हैं?

डेढ़ साल.

आप दिल्ली की रहने वाली हैं?

नहीं. मैं उत्तर प्रदेश में मुजफ़्फ़ऱनगर की रहने वाली हूँ.

तो मुजफ़्फ़ऱनगर ख़ास में रहती हैं या कहीं आसपास?

मैं सामली गाँव की हूँ.

वहीं के तो किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत भी थे?

वो सिसौली है. सामली के पास ही है. सामली, सिसौली.. भौरा.. ये सब आस-पास ही हैं
मॉडलिंग में आपको कितना संघर्ष करना पड़ा?
मुझे ज़्यादा स्ट्रगल नहीं करना पड़ा. जब मैं मुजफ़्फ़ऱनगर में रहती थी तभी से मेरे पास ऑफऱ आने शुरू हो गए थे. मॉडलिंग की दुनिया तो बहुत चकाचौंध से भरी है. दिखावा बहुत है. अँग्रेजिय़त भरी हुई है. आप कभी ख़ुद को मिसफि़ट नहीं पातीं? नहीं, नहीं, नहीं. जब मैंने शुरुआत की थी तो मुझे लगा था कि यहाँ पर (मॉडलिंग की दुनिया में) सभी लोग अँग्रेज़ी बोलते हैं, हिंदी कम चलती है. लेकिन जब मैं मीटिंगों में जाती थी तो इस कॉनफिड़ेंस के साथ जाती थी कि मुझे पता है कि मॉडलिंग क्या होता है -- रैम्प पर चलना, फ़ोटो शूट करना, पोज़ करना.... तो जो मॉडल्स इंग्लिश बोलती थीं, मैं उनसे आगे होती थी. मैं दिखाती थी कि मैं हिंदुस्तानी हूँ. मुझे हमेशा लगता है कि मैं सुंदर हूँ और मुझमें वो सब कुछ है जो एक अँग्रेज़ी बोलने वाली लड़की में नहीं है.
आपने पढ़ाई कहाँ से की?
"अच्छी भी लड़की होगी तो उसके बारे में पड़ोसी गंदा ही बोलेंगे कि बाहर क्यों भेज रहे हो, मॉडलिंग क्यों करवा रहे हो, मॉडलिंग अच्छी नहीं होती है.... मेरे मम्मी पापा तो बस हमेशा ही बोलते हैं कि हम तो चाहते हैं कि तू कामयाब हो. बस तेरे बारे में कुछ (ग़लत) सुनने को न मिले." वहीं मुजफ़्फ़ऱनगर से. मेरे पापा किसान हैं. उनको मेरे बारे में सब पता है कि मैं मॉडलिंग करती हूँ. अगर वो यहाँ आ भी जाएँ तो भी कोई बात नहीं. जैसे लड़कियाँ घर वालों से छिपाकर मॉडलिंग करती हैं, मेरे साथ ऐसा नहीं है. मुझे पूरी छूट है. मेरे पापा कहते हैं बेटा, इज़्ज़त से रहना. तेरी लाइफ़ है इन्ज्वॉय करो. पर कभी ऐसा न हो कि लोग कहें कि छोटे से गाँव से लड़की आई है और उसने ग़लत काम किया ताकि हमारी इज़्ज़त पर आँच आए.
काफ़ी समझदारी की बात है.
ये मुझे मेरे मम्मी पापा से मिला. पड़ोस तो आप जानते ही हैं कैसा होता है. अच्छी भी लड़की होगी तो उसके बारे में पड़ोसी गंदा ही बोलेंगे कि बाहर क्यों भेज रहे हो, मॉडलिंग क्यों करवा रहे हो, मॉडलिंग अच्छी नहीं होती है.... मेरे मम्मी पापा तो बस हमेशा ही बोलते हैं कि हम तो चाहते हैं कि तू कामयाब हो. बस तेरे बारे में कुछ (ग़लत) सुनने को न मिले.
तो मॉडलिंग के करियर में आप कहाँ तक पहुँचना चाहती हैं.
मैं कोई दिमाग़ी टेंशन नहीं लेती. इन्ज्वॉय ज़्यादा करती हूँ. मेरे साथ ऐसा नहीं है कि मुझे बहुत ऊपर तक पहुँचना है... मॉडलिंग ही कर रही हूँ, यही करूँगी. लेकिन ऊपर पहुँचने के लिए कोई ग़लत काम नहीं करूँगी. मैं बहुत सारी चीज़ें कि़स्मत पर छोड़ देती हूँ.

"जब मैंने शुरुआत की थी तो मुझे लगा था कि यहाँ पर (मॉडलिंग की दुनिया में) सभी लोग अँग्रेज़ी बोलते हैं, हिंदी कम चलती है. लेकिन जब मैं मीटिंगों में जाती थी तो इस कॉनफिड़ेंस के साथ जाती थी कि मुझे पता है कि मॉडलिंग क्या होता है -- रैम्प पर चलना, फ़ोटो शूट करना, पोज़ करना.... तो जो मॉडल्स इंग्लिश बोलती थीं, मैं उनसे आगे होती थी. मैं दिखाती थी कि मैं हिंदुस्तानी हूँ."
मीनाक्षी बालियान

मंगलवार, 22 मार्च 2011

'राखी का इन्साफ' इंदौर में होगा....

"ड्रामा क्वीन" के नाम से मशहूर राखी सावंत की मेजबानी वाले रियलिटी टीवी शो ‘राखी का इन्साफ’ में पिछले साल कथित अभद्र टिप्पणियों के खिलाफ दायर याचिका पर एक स्थानीय अदालत में जारी सुनवाई में सोमवार को नया मोड़ आ गया।

याचिकाकर्ता ने अपने आरोपों के समर्थन में अदालत में सूचना और प्रसारण मंत्रालय का एक पत्र पेश किया तथा राखी समेत रियलिटी शो से जुड़े चार लोगों पर मुकदमा चलाये जाने की गुहार की।

शहर के वकील किशन कुन्हारे ने बताया कि उनके मुवक्किल किशोर मरमट ने ‘राखी के इन्साफ’ में हुई अभद्र टिप्पणियों को लेकर अदालत में गत नवंबर में याचिका दायर की थी। साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय को भी इस कार्यक्रम की शिकायत की थी। उनकी शिकायत के संबंध में सूचना और प्रसारण मंत्रालय का एक पत्र मिला है।

उनके मुताबिक इस पत्र में बताया गया है कि 'राखी का इन्साफ' के खिलाफ मिली शिकायतों का संज्ञान लेते हुए मंत्रालय इमैजिन टीवी चैनल को इस रियलिटी शो का प्रसारण रात 11 बजे के बाद करने और इसकी विषयवस्तु को तय मापदंडों के मुताबिक ढालने के निर्देश पहले ही दे चुका है।

कुन्हारे ने बताया कि प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट भूपेंद्र नकवाल की अदालत में याचिका पर सुनवाई के दौरान सूचना और प्रसारण मंत्रालय के इस पत्र को पेश किया गया तथा राखी समेत कार्यक्रम से जुड़े चार लोगों पर संबद्ध धाराओं में मुकदमा चलाये जाने की गुहार की गई।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि राखी के धारावाहिक में अदालती प्रक्रिया की भौंडी नकल और अभद्र टिप्पणियाँ की गईं, जिससे ‘न्याय की देवी’ पर आस्था रखने वाले उन जैसे कई लोगों की भावनाएँ आहत हुईं। अदालत ने याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 20 अप्रैल की तारीख तय की है।

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

हर दिन ‘विमेन्स डे’……

दुनिया भर में आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रुप में मनाया जाता है. लेकिन बॉलीवुड के कई सितारे मानते हैं कि हर दिन महिलाओं का दिन होता है. निर्देशक और कोरियोग्राफ़र फ़राह ख़ान इस मौके पर महिलाओं को बधाई देने की ज़रूरत नहीं महसूस करतीं. वो कहती हैं, “मुझे इस दिन किसी महिला को ‘ऑल द बेस्ट’ कहने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ‘विमेन आर द बेस्ट ‘ (महिलाएं सर्वश्रेष्ठ होती ही हैं). हर महिला अपने-आप में एक क़ामयाब औरत होती है चाहे वो घर में रह कर अपने घर ही क्यों न संभाल रही हों क्योंकि वो भी एक बहुत बड़ी उप्लब्धि है. फ़राह मानती है कि हर दिन महिला दिवस होता है क्योंकि आप एक भी दिन महिलाओं के बिना नहीं गुज़ार सकते, चाहे वो आप ख़ुद हों, आपकी मां हो, या फिर आपके घर की सफ़ाई करने वाली या आपका खाना बनाने वाली बाई. इसी तरह प्रीति ज़िंटा भी कहती हैं, “महिला दिवस सिर्फ़ एक ही दिन क्यों मनाया जाए, हर दिन हमारा दिन होता है.” औरतों के साथ छेड़खानी या फिर हिंसा के मामलों से निपटने के लिए प्रीति मानती हैं कि ऐसे पुलिस कंट्रोल रुम होने चाहिए जिनमें ज़्यादा महिला पुलिसकर्मी हों ताकि महिलाएं उनसे आसानी से बात कर सकें. इमरान ख़ान को भी एक ही दिन महिला दिवस मनाने का विचार समझ नहीं आता है. साढ़े आठ साल के रिश्ते के बाद हाल ही में शादी के बंधन में बंधे इमरान कहते हैं, “अपने अनुभव के आधार पर मैं तो यही कहूंगा कि हर दिन महिलाओं का दिन होता है. पुरुषों के लिए तो अभी तक कोई दिन ही नहीं बना.” सामाजिक मुद्दों से जुड़ी जानी-मानी अभिनेत्री शबाना आज़मी मानती हैं कि पिछले दिनों में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं जो बहुत परेशानी की बात है. उनका कहना है, “ज़रूरत इस बात की है कि हम अपनी औरतों की इज़्ज़त करें और उन्हें वो हक़ दें जो आज़ादी दे सकती है.” अभिषेक बच्चन कहते हैं कि महिलाएं पुरुषों से बेहतर होती हैं और वो हमारे प्यार और सम्मान की हक़दार हैं. माधुरी दीक्षित का कहना है, “आज जब महिलाएं चांद पर भी पहुंच गई हैं तो यही कहूंगी कि आप कोई सपना देख सकते हैं और उसे साकार कर सकते हैं.” आमिर ख़ान को महिला सशक्तिकरण की बातें करना बेफ़कूफ़ी लगती है. वो कहते हैं, “इसमें कहने वाली बात क्या है, महिलाएं भी पुरुषों की ही तरह स्वतंत्र, मज़बूत और अपने-आप में संपूर्ण होती हैं. मैं सभी इंसानों की समानता में यक़ीन रखता हूं.” निर्दशक मेघना गुलज़ार की सोच इस बारे में थोड़ी अलग है. वो कहती हैं, “मैं महिला दिवस जैसे विचारों को नहीं मानती, मैं मानती हूं कि हर इंसान बराबर होता है. हमें किसी एक दिन की ज़रूरत नहीं है....हर इंसान को अपनी ज़िंदगी के हर दिन जश्न मनाना चाहिए.”

गुरुवार, 10 मार्च 2011

अब भी डायन मानी जाती हैं महिलाएं


सोनभद्र के इस इलाके में पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं.

महिला दिवस का मौक़ा हो या महिला सशक्तीकरण का कोई उत्सव.भारत में महिलाओं पर अत्याचार और उनके ख़िलाफ़ घिनौने अपराधों को लेकर अक्सर आवाज़ उठाई जाती है. लेकिन इन्हें पूरी तरह ख़त्म करने में शायद दशकों लगें. उत्तरप्रदेश के सोनभद्र ज़िले में महिलाओं को डायन कहकर शारीरिक यातानाएं दिए जाने का एक मामला फिर सामने आया है. हैरत ये है कि प्रशासन इन महिलाओं के आरोपों को सामान्य क़रार दे रहा है और मामले को रफ़ा-दफ़ा करने में जुटा है. उत्तरप्रदेश के सोनभद्र ज़िले के जामपानी गांव में सात मार्च को दो महिलाओं को 'डायन' कहकर उनकी लाठी-डंडों से पिटाई की गई. पहवा और जासो देवी नामक इन महिलाओं का कहना है कि उन्हें डायन और भूत कहते हुए गांव के एक व्यक्ति और उसकी पत्नी ने न सिर्फ मारा बल्कि उनके ‘ज़ख्मों पर मिर्च भी लगाई’. जासो देवी ने बीबीसी को बताया, "हम अपने घर की ओर लौट रहे थे कि रास्ते में हमें पकड़ लिया और एक कमरे में ले गए. वहां हमें बहुत मारा, यहां तक कि हमारे हाथ-पैर नीले हो गए और हमारे ज़ख्मों पर मिर्च लगाई. फिर हमें कमरे में बंद कर दिया." अपनी आपबीती सुनाते हुए पहवा देवी ने कहा, "जब वो हमें मार रहे थे तब हमें बचाने के लिए कोई नहीं आया. लोग खड़े होकर तमाशा देख रहे थे लेकिन बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया." इस इलाक़े में महिलाओं के अधिकारों को लेकर काम करने वाली संस्था वनवासी सेवा आश्रम से जुड़ी शोभा देवी ने बीबीसी को बताया, "यहां एक शिवगुरु चर्चा चलती है जिसमें लोग पूछते हैं कि किसी बीमारी की वजह क्या है". "उसमें एक युगल को बताया गया कि उनके घर के दक्षिण में जो रहता है उसने उनके बच्चे पर जादू-टोना कर दिया है. इसके बाद वो इन महिलाओं को पकड़ कर ले गए और उन्हें मारा." इस मामले की सूचना पाकर मौक़े पर पहुंचे एक स्थानीय वकील सूर्यमणि यादव ने बताया, "मैंने देखा कि कुछ लोगों ने इन औरतों को घेरकर बंधक बना रखा है. उन्हें काफ़ी चोटें आई थीं. "मार-पिटाई करने वालों का आरोप था कि इन औरतों ने उनके बच्चे पर जादू-टोना कर दिया है. हमने उन्हें समझाया और अंधविश्वास के लिए फटकार लगाई. फिर महिलाओं को अस्पताल ले जाया गया". इलाक़े के पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार ने बीबीसी को बताया कि महिलाओं की शिकायत पर एक व्यक्ति को हिरासत में ले लिया गया है और उसके ख़िलाफ़ धारा 323, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया है. हालांकि पुलिस अधीक्षक का कहना है कि यह एक समान्य मामला है और आदिवासी बहुल इस इलाके में महिलाओं को डायन कहा जाना आम है. उन्होंने कहा, "ये गोंड आदिवासियों का इलाक़ा है. यहां प्रचलित सामाजिक कुरीतियों के तहत महिलाओं पर अक्सर इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं". "ये एक सामान्य मारपीट का मामला है. बाक़ी की कार्रवाई हम कोर्ट के आदेश से करेंगे." ऐसे में इन महिलाओं की मदद को पहुंची शोभा देवी का कहना है कि पुलिस की गंभीरता इस बात से ही ज़ाहिर होती है कि इलाक़े के थाना इंजार्च ने घटनास्थल का मुआएना तक नहीं किया है और मौक़े पर पहुंचे दो सिपाहियों के हवाले से मामला दर्ज किया गया है. उन्होंने बताया कि इस इलाक़े में पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं और पुलिस को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए. उन्होंने कहा, "पुलिस ने एफआईआर में सिर्फ मारपीट का मामला दर्ज किया है. ये महिलाएं तो खुद लिख नहीं सकतीं लेकिन उन्होने पुलिस को साफ़तौर पर बताया है कि उन्हें बुरी तरह पीटा गया है और उनके ज़ख्मों पर मिर्चें आ दि लगाई गईं."

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011


शेखर झा
राज्य के कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए टाटा स्टील के द्वारा चार दिवसीय ‘आर्ट इन इंडस्ट्री’ का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में नागपुर, जमशेदपुर, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, बैंग्लोर के अलावा छत्तीसगढ़ के भी विभिन्न जिलों के कलाकारों नें भाग लिया। किसी ने अपने चित्र में शांति का संदेश दिया, किसी ने पर्यटन स्थलों को दर्शाया। कौन कहता है कि पेंटिंग्स नहीं बोलती, कलाकारों के द्वारा बनाए गए हर चित्र कुछ कहते नजर आए। प्रदर्शनी में 25 कलाकारों के द्वारा विगत तीन दिनों में बनाई पेंटिंग्स का प्रदर्शन किया गया। पेंटिंग्स देखने के लिए कलाप्रेमी सहित स्कूल, कॉलेज के स्टूडेंट्स भी पहुंचे। उल्लेखनीय है कि टाटा स्टील द्वारा कला एवं कलाकारों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से ये अनूठी पहल की गई। महंत घासीदास मेमोरियल म्यूजियम में कलाकारों के चित्रों का प्रदर्शन किया गया।
पेंटिंग्स में पर्यटन स्थल
नक्सलियों के खौफ से लोग तीर्थगढ़, चित्रकूट के अलावा नक्सल प्रभावित इलाकों में आने वाले पर्यटन स्थल जाने से डरने लगे हैं। जगदलपुर के कलाकार विजय विश्वकर्मा ने अपनी पेंटिंग में तीर्थगढ़ को बनाया। उन्होंने अपने चित्र में दर्शाया कि देश में छत्तीसगढ़ को पर्यटन स्थल की वजह से ही जाना जाता है। यहां पर पिछले कुछ सालों से पर्यटक नक्सलियों के डर से आना कम कर दिए हैं। उन्होंने अपनी पेंटिंग में झील के पास एक भोली-सी लड़की की पेंटिंग का चित्रण किया। उस पेंटिंग्स से उन्होनें लोगों को बताना चाहा कि बस्तर के लोग कितने भोले हैं। श्री विश्वकर्मा पूर्व में नागपुर, जमशेदपुर, भोपाल, रायपुर व अन्य जगहों में अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगा चुके हंै।
शौक के चलते बना चित्रकार
जमशेदपुर के कलाकार अर्जुन दास ने बताया कि मुझे पेंटिंग्स बनाने का शौक बचपन से है। जब मैं कक्षा तीसरी कक्षा में पढ़ता था तबसे ही मैंने चित्र बनाना शुरू कर दिया था। उनहोंने बताया कि प्रदर्शनी में मैंने तीन पेंटिंग्स को प्रदर्शन के लिए रखा है। इनमें से एक गौतम बुद्ध की पेंटिंग्स भी थी। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में लोगों छोटी-छोटी बात को लेकर झगड़ना शुरू कर देते हैं। लोगों को इस पेंटिंग्स के द्वारा बताया गया कि हमेशा शांत रहना चाहिए, कोई भी काम करना हो तो शांति से करना चाहिए।
सफल व्यक्ति के पीछे कोई महिला
किसी भी व्यक्ति की सफलता का श्रेय उससे पीछे खड़ी किसी महिला को ही जाता है। वो आपकी पत्नी, मां, बेटी, प्रेमिका कोई भी हो सकती है। भुवनेश्वर से आए मानस रंजन ने अपने चित्र में कुछ इस तरह का ही चित्रांकन किया था। उन्होने अपने चित्र में एक महिला को किसी का इंतजार करते हुए चित्रित किया। वर्तमान समय में पढ़ाई हो, कोई अन्य क्षेत्र सभी जगह महिलाओं की पहुंच है। पुरूष की अपेक्षा महिला किसी भी काम को अच्छे से कर सकती हंै।
नाचा नृत्य का चित्रांकन
बस्तर से आए पिसारू राम ने अपनी पेंटिंग्स में संस्कृति की झलक दिखाई। पेंटिंग्स में उन्होंने नाचा नृत्य का चित्रांकन किया। उन्होंने बताया कि मैंने 20 साल की उम्र से चित्र बनाना शुरू किया था। अब तक मैंने भोपाल, जमशेदपुर, बैंग्लोर, रायपुर के साथ अन्य जगहों में अपने चित्रों का प्रदर्शन कर चुका हूं।

बचपन से शोक था पेंटिंग्स का



शेखर झा
कुछ कर दिखाने का जज्बा हो तो इंसान सभी कामों को आसानी से कर सकते हैं, बस इंसान को अपने लक्ष्य से भटकना नहीं चाहिए। इंसान को हमेशा अपने लक्ष्य को देखते हुए काम करना चाहिए, इससे उसे सफलता जल्द मिल जाती है। ऐसा ही एक उदाहरण गुरू तेगबहादुर भवन में लगी प्रदर्शनी में देखने को मिला। खजुराहो (एमपी) से आए दिनेश सिंह एक से बढ़कर पेंटिंग्स बनाते हैं। वो मुख्यत: एक्रेलिक, आॅइल मीडियम की पेंटिंग बनाते हैं। इसमें भी उनकी कैनवास पर पकड़ अच्छी होने के साथ वो वेलवेट, कॉटन फेबरिक, पेपर पर भी अपनी कल्पना को आकार देते हैं।
देखकर पेंटिंग्स बनाने का शौक

जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ाई करता था तबसे मुझे पेंटिंग बनाने का शौक है। मुझे मालूम नहीं था कि मेरी बनाई पेंटिंग्स को एक दिन देश-विदेश में भी सराहा जाएगा। जब मैं हायर सेकेंडरी की पढ़ाई कर रहा था तो शहर में कहीं भी चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता था तो अवश्य देखने जाता था। प्रदर्शनी में दूसरे के द्वारा बनाई पेंटिंग को देखकर मुझे भी शौक होता था कि काश मुझे भी इतनी अच्छी पेंटिंग बनानी आती। बचपन का शौक जुनून में बदल गया। मेरे बनाए चित्रों को देश के साथ विदेशों में भी प्रदर्शन का मौका मिल रहा है। विगत वर्ष कलकत्ता में लगी कारीगर हार्ट में मेरी एक पेंटिंग को पांचवां स्थान और उसके लिए सम्मानित भी किया गया था।
पेंटिंग्स में साइनिंग जरूरी
राधा कृष्ण आर्ट के संचालक दिनेश सिंह ने कैनवास और वेलवेट पर मुगल शैली, राजपूताना शैली का बड़ी खूबसूरती से चित्रांकन किया है। इसके अलावा उन्होंने सीनरी, एनिमल, वर्ड, भगवान के चित्र भी तैयार किए हैं। वहीं वो लोगों के द्वारा बताए गए चित्रों को भी बनाते हैं। इन चित्रों को बनाने के लिए वो स्टोन, कैमल, वैजिटेबल कलर के अलावा अन्य रंगों का भी यूज करते हैं। चित्र में साइनिंग लाने के लिए वो कलर की मैचिंग का ज्ञान भी जरूरी मानते हैं, जिससे चित्रों में साइनिंग आती है।
कई जगह लगा चुके हंै प्रदर्शनी
दिनेश अपनी पेंटिंग्स का प्रदर्शन मुम्बई, हैदराबाद, बैंग्लोर, गोवा, पुणे सहित अन्य मेट्रो सिटी में कर चुके हैं। उनकी पेंटिंग्स की खरीदी अमेरिका, फांस, लंदन, पेरिस जर्मन के लोगों ने भी की है। उन्होंने बताया कि मैंने पचास रुपए से लेकर पचास हजार तक की पेंटिंग बनाई है। इस वक्त उनके पास पचास रुपए से लेकर बीस हजार तक की पेंटिंग्स उपलब्ध हैं।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

यूपी के एक स्कूल में गाया जाता है 'नया राष्ट्रगान'

उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर जिले में एक प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट ने अपनी तरफ से राष्ट्रगान में बदलाव कर दिए हैं। यहं बच्चों से यह नया राष्ट्रगान गवाया जा रहा है।
जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर टांडा कस्बे के लॉर्ड बुद्धा आंबेडकर अर्जक मिशन पब्लिक स्कूल के छात्र विद्यालय की सुबह की प्राथर्ना में रोज ' संशोधित ' राष्ट्रगान गाते हैं। कुछ सप्ताह पहले विद्यालय के प्रबंधक रघुनाथ सिंह ने राष्ट्रगान की कुछ पंक्तियों के शब्दों को बदल दिया। तब से यह सिलसिला जारी है। गौरतलब है कि बुनियादी शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त कक्षा पांच तक के इस स्कूल में 400 छात्र हैं।
छात्रों द्वारा प्राथर्ना में गाए जा रहे संशोधित राष्ट्रगान की दूसरी पंक्ति में उल्लिखित 'अधिनायक' शब्द की जगह ' उत्प्रेरक ' शब्द गाया जा रहा है। इसी तरह तीसरी पंक्ति के शब्द 'भारत भाग्य विधाता' के बदले 'स्वर्णिम भारत निर्माता' गाया जा रहा है। 'तव शुभ आशीष मांगे' को 'तब शुभ कामना मांगे' गाया जा रहा है। रघुनाथ सिंह ने सोमवार को यहां संवाददाताओं से कहा, ' अधिनायक शब्द राजा को संबोधन के लिए था। अब हम स्वतंत्र हैं। लोकतंत्र में ' अधिनायक ' शब्द का कोई मतलब नहीं है। ' सिंह ने कहा कि ' यह राष्ट्रगान पहली बार ब्रिटिश शासक जार्ज पंचम के स्वागत में गाया गया था। मेरे विचार में राष्ट्रगान की कई पंक्तियां राजा का यशोगान करती हैं। इसलिए मैंने उन्हें बदल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रगान में संशोधन करने के पीछे उनका मकसद देश के लोगों की भावनाओं को आहत करना नहीं है। वह स्वयं एक भारतीय हैं, इसलिए वह ऐसा सोच भी नहीं सकते। इस बारे में पूछे जाने पर जिला बुनियादी शिक्षा अधिकारी (बीएसए) राकेश कुमार ने बताया कि यह मामला उनकी जानकारी में पहले से है। उन्होंने कहा,मैंने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। इस स्कूल की मान्यता रद्द करके प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। '

आनंद को सम्मानित...

तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में प्रवेश के लिए बिहार में कमजोर तबके के छात्रों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराने वाले कोचिंग सेंटर ' सुपर 30 ' के संस्थापक और गणितज्ञ आनंद कुमार को शनिवार को सम्मानित करेंगे।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा मुम्बई में एक संस्था ' बिहार फाउंडेशन के मुम्बई चेप्टर ' द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में आनंद को सम्मानित करेंगे। ' बिहार फाउंडेशन ' की प्रवक्ता रागिनी गौतम ने बताया, ' आनंद ने समाज के कमजोर तबके के छात्रों को आईआईटी पहुंचाकर उनके जीवन स्तर में बड़ा बदलाव लाया है। हमने उन्हें कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया है। दलाई लामा उन्हें एक स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित करेंगे। फाउंडेशन की स्थापना बिहार सरकार की मदद से वर्ष 2008 में की गई थी और विदेशों में इसकी कुल सात शाखाएं हैं। उन्होंने बताया कि दलाई लामा पहली बार पश्चिमी भारत, बिहार और बौद्ध के नए संबंध को लेकर व्याखान देंगे। सम्मान से बेहद खुश आनंद ने कहा, ' दलाई लामा एक आध्यात्मिक नेता हैं। उनके आशीर्वाद से मेरे काम में और मदद मिलेगी। ऐसे पुरस्कारों से मुझे प्रेरणा मिलती है , लेकिन समाज के प्रति दायित्व भी बढ़ जाता है। गौरतलब है कि आनंद पैसे के अभाव में पढ़ाई के लिए कैंब्रिज नहीं जा सके थे और उन्होंने वर्ष 1992 में ' रामानुजम स्कूल आॅफ मैथमेटिक्स ' से अध्यापन शुरू किया था। बाद में आनंद ने वर्ष 2002 में ' सुपर 30 ' की स्थापना की थी। पिछले आठ सालों में ' सुपर 30 ' की कारगर पहल और मेहनत की बदौलत 212 छात्रों को आईआईटी में प्रवेश मिल चुका है। पिछले तीन सालों से कोचिंग सेंटर के सभी 30 छात्र प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश पाने में कामयाब हो रहे हैं। पिछले साल अमेरिकी पत्रिका ' टाइम ' ने आनंद को ' बेस्ट आॅफ द एशिया ' घोषित किया था, वहीं पत्रिका 'न्यूजवीक' ने ' सुपर 30 ' को दुनिया के चार प्रयोगधर्मी विद्यालयों में शामिल किया है। इसके अलावा मुकेश अंबानी ने वर्ष 2007 में इन्हें ' रीयल हीरो अवार्ड ' से नवाजा था।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

अंधेरे के बाद उजाला है...

अंधेरे के बाद उजाला है इसलिए अंधेरे से घबराओ मत, निरंतर आगे बढ़ते चलो। यदि तुम्हारे आदर्श सही हैं, तुम्हारी सोच सही है तो तुम्हारे प्रयास एक न एक दिन जरूर सफल होंगे... इन लाइन को याद करते हुए हिना यास्मीन खान की आंखें भर आती हैं। वो स्वयं को संभलते हुए कहती हैं कि ये इनकी कुछ ऐसी पंक्तियां थीं जिन्हें अक्सर ये दोहराते रहते थे। मुझे क्या पता था कि एक दिन ये पंक्तियां मेरे जीवन को संबल प्रदान करने में मददगार बनेंगी। ये कहना शहीद पुलिस निरीक्षक स्वर्गीय श्री अब्दुल वहीद खान की पत्नी हिना यास्मीन खान का है। डेढ़ साल पहले नक्सली हमले में शहीद हुए श्री खान के जाने के बाद वो सिंगल पैरेंट्स की भूमिका का बखूबी निवर्हन कर रही हैं। श्रीमती हिना की तरह ही अन्य शहीद पुलिस जवानों की विधवाओं और उनके परिवारजनों को जहां अपने पति, बेटे और भाई की शहादत पर गर्व है वहीं अपने किसी अजीज की ताउम्र जुदाई का दंश समय-समय पर उन्हें बिलखने को मजबूर कर देता है।
शेखर झा
बच्चों के सामने रोना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि उनके सामने रोना यानि कि स्वयं को कमजोर साबित करना और उन्हें उनके पिता की याद दिलाना। इसलिए मैं अकेले में या जब बच्चे सो जाते हैं तो रो लिया करती हूं मगर बच्चों के सामने खुद के दुख का अंदाजा नहीं होने देती। छलकते आंसुओं के रूप में ये पीड़ा उन शहीद पुलिस जवानों की विधवाओं और परिवारजनों की आंखों में साफ झलक रही थी, जो अपने पति और परिवार के सदस्य को नक्सली हमले की घटनाओं में खो चुके हैं। इन शहीदों की शहादत पर जहां इनके परिवारवालों को गर्व है वहीं इन्हें खोने का दर्द घर के सदस्यों को इतना ज्यादा है जिसकी पूर्ति ताउम्र किसी भी रूप से नहीं की जा सकती है। वहीं शहीदों की पत्नियां स्वयं को संभलकर अपने और अपने बच्चों के लिए माता-पिता दोनों की भूमिका निभा रही हैं। बतौर सिंगल पैरेंट्स ये अपने शहीद पति और बच्चों के ख्वाब पूरे करने में अपनी ओर से निरंतर कोशिश करने में लगी हुई हैं।
क्वालिटी टाइम एहसास के रूप में
किसी भी शहीद की विधवा के लिए उसके पति की शहादत गर्व का अहसास तो कराती है मगर उनके खोने का गम चाहे कोई अधिकारी हो या कोई सिपाही उसके परिवारवालों के लिए बराबर ही होता है । ये कहना राजनांदगाव में शहीद पुलिस अधीक्षक स्वर्गीय विनोद कुमार चौबे की धर्मपत्नी रंजना चौबे का है। उल्लेखनीय है कि श्री चौबे वर्ष 2009 में जिले में ही ग्राम मदनवाड़ा और सीतागांव के पास नक्सल हमले की घटनाओं में शहीद हुए थे। श्रीमती चौबे कहती हैं कि आज वो मेरे साथ नहीं मगर उनके साथ बिताया हुआ क्वालिटी टाइम एक एहसास के रूप में मेरे साथ है। जब भी मैं स्वयं को कमजोर पाती हूं तो इनकी याद मुझे एक पॉजीटिव एनर्जी का एहसास दिलाती है। नक्सलवाद की समस्या के लिए लोगों के भय को जिम्मेदार मानते हुए श्रीमती चौबे कहती हैं कि आज भी ग्रामीण जनता में नक्सली लोगों के प्रति भय उन्हें उनकी मदद करने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए लोगों को भयमुक्त होकर पुलिस प्रशासन को नक्सलियों को खत्म करने में सहयोग देना चाहिए। जहां ग्रामीण लोग भय के चलते वहीं पढ़े-लिखे लोगों अपने पुराने सिंद्धातों पर टिके रहने की भावना के चलते ऐसे लोगों को सहयोग देते हैं। विनायक सेन के संदर्भ में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग मानवाधिकार की बात करके राष्ट्रद्रोह कर रहे हैं वो वास्तिवकता से काफी दूर हैं। यदि उन्हें जरूरतमंद लोगों के लिए कुछ करना है तो उन्हें जन-प्रतिनिधि बनकर जनता की मदद करना चाहिए। संविधान में रहकर कार्य करना चाहिए। स्वर्गीय चौबे के पुत्र सौमिल चौबे के लिए भी अपने पिता के कार्य के प्रति समर्पण के भव उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। इसके साथ ही उनकी लीडरशिप क्वालिटी का भी मैं अपने जीवन में अनुशरण करना चाहता हूं।
हाउसवाइफ से अधिकारी पद तक
जो कार्य पुरुष के होते हैं वो यदि कोई महिला करें तो मुश्किल तो आती ही है खासतौर पर जो महिला प्योर हाउसवाइफ हो। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ। हाउसवाइफ से कलेक्ट्रेट में सहायक जिला अभीयोजन अधिकारी तक का सफर तय करना वाकई बहुत मुश्किल था। हिना यास्मीन खान कहती हैं कि अगर परिवार, सोसाइटी के सहयोग की बात करें तो सहानभूति देने वालों की कमी नहीं थी। किंतु ऐसी स्थिति से उबरकर दोबारा खुद को और बच्चों को संभलना मुझे ही था। हालांकि एक पुलिसवाले की बीवी होने के नाते इन्होंने मुझे हमेशा मेंटली रूप से इस चींज के लिए प्रिपेयर करके रखा था कि कल को यदि किसी मोड़ पर जब वो न होंगे तो मुझे ही सबकुछ संभलना होगा। जब ये शहीद हुए उस वक्त मेरे दोनों बेटे अमन और यासर खान बारहवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। इनकी दिली इच्छा थी कि दोनों बच्चे आईआईटी करके आईपीएस करें तो उनका एक ख्वाहिश तो पूरी हो गई है। बड़ा बेटा अमन इसरो में और छोटा यासर मुबंई आईआईटी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है।
भाई की काफी याद आती है
मदनवाड़ व सीतापुर के पास वर्ष 2009 में पुलिस नक्सली मुठभेड़ में ही शहीद हुए प्रधान पुलिस आरक्षक संजय यादव के भाई सुनील यादव बताते हैं कि राज्य सरकार की ओर से समय-समय पर मदद मिलती रहती है। भईया के शहीद होने के बाद मुझे कुछ दिनों तक विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भईया सदा के लिए हमें छोड़कर चले गए हैं। भईया के गुजरने के बाद भी अपने बच्चे के साथ मायके मे रहने लगीं। जब भईया थे तो वो ही पूरे परिवार को चलाते थे। उनके गुजर जाने के बाद घर की स्थिति काफ ी नाजुक हो गई थी। उस वक्त मैंने और पापा ने नौकरी करना शुरु की। सुनील का कहना है कि नक्सलवाद के खात्मे के लिए के न्द्र व राज्य सरकार की तरफ से ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। ऐसा जब तक नहीं होगा तब तक न जानें कितने ही जवानों को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ेगी। शहीद संजय की मां श्यामाबाई डबडबाती आंखों से कहती हैं कि संजय हमारे घर का चिराग था। बेटे के गुजरने के बाद तो जैसे घर से रौनक ही गायब हो गई। मेरा बेटा मरा नहीं है अपने देश के लिए शहीद हुआ है। वर्तमान समय के सभी नवयुवकों को भी देश की सुरक्षा में अपना योगदान देना चाहिए।
घर का पूरा मेरे कंधे पर
20 फरवरी 2000 को नारायणपुर के बकूलवाही में पदस्थ एडिशनल एसपी भास्कर दिवान की धर्मपत्नी रेखा भास्कर ने बताया कि इनके गुजरने के बाद मुझे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इनके गुजरने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। जब मेरे पति शहीद हुए तब मेरा बेटा तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था। वर्तमान समय में मेरा लड़का बीटीआई रायपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। पति के गुजरने के बाद घर व बच्चे की पढ़ाई के लिए मैंने नौकरी करना शुरु की। वर्तमान में मैं डिग्री गर्ल्स कॉलेज में प्रोफेसर पद पर पदरत हूं। कम उम्र में पिता का साया बच्चे के सिर से हट गया था, ऐसे में मैंने अपने बच्चे को माता-पिता दोनों का प्यार दिया। श्रीमती दीवान कहती हैं कि मैंने काफी अपने बच्चे को ये महसूस नहीं होने दिया कि उसके पापा नहीं है। उनके गुजरने के बाद मेरा जो कुछ था वो बस मेरा बेटा ही था। इनकी ख्वाहिश थी कि उनका बेटा पढ़-लिखकर खूब नाम कमाएं। ये हमेशा कहां करते थे कि सत्य भले ही परेशान करता हो, मगर हारता नहीं है। जो भी काम करें ईमानदारी और निष्ठा के साथ करें।







बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

वल्डकप देखेंगे एलसीडी पर

शेखर झा
क्रिकेट की दीवानगी से हर कोई वाकिफ है। खास वर्ल्डकप को देखते हुए विभिन्न टेलीविजन निर्माता कंपनियां भी इस मौके को भुनाने से नहीं चूकना चाहती हैं। इसके लिए उन्होंने अभी से टीवी और एलसीडी पर छूट देना भी शुरु कर दी है। जाहिर-सी बात है कि क्रिकेट प्रेमी 19 फरवरी से शुरु होने वाले वर्ल्डकप को देखते समय किसी प्रकार भी प्रकार के परेशानी झेलना पसंद नहीं करेंगे। इसके साथ ही स्टेडियम का मजा घर बैठे ही लेना चाहते होंगे। इसी चीज को समझते हुए कंपनियों ने बेहतर पिक्चर क्वालिटी, बेहतर साउंड की के लिए क्रिकेट प्रेमियों को अपनी पुरानी टीवी एक्सचेंज करके नई टीवी देने का आफर दे रही हैं। राजधानी में भी ये आफर शुरु हो चुका है। इसके साथ क्रिकेट देखते समय कहीं केबल बंद न हो जाए इस डर से भी ज्यादातर लोग अपने घर पर डीटीएच कनेक्शन लेना पसंद कर रहे हैं।
एलसीडी पर छूट
जयस्तंभ चौक स्थित फेयरडील सोनी शोरुम के संचालक रवि मेघानी ने बताया कि कुछ ही दिनों बाद से शुरु हो रहे वर्ल्डकप को देखते हुए हमारे यहां क्रिकेट प्रेमियों को विशेष छूट दी जा रही है। अभी हमारे यहां टीवी और होमथियेटर पर छूट दी जा रही है। इसके अलावा सभी टीवी सैट के साथ एयरटेल का डीटीएच कनेक्शन भी फ्री दिया जा रहा है। पिछले 15 दिनों से शुरु हुआ ये आॅफर खास वर्ल्डकप को देखते हुए ही शुरु किया गया है। इसके साथ ही इस आफर के चलते टीवी सैट खरीदने वाले लोगों को सोनी कम्पनी के द्वारा एक कूपन दिया जा रहा है। इस दौरान सभी कस्टमर में से 100 लोगों को लकी ड्रा के तहत चुनकर भारतीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से मिलने का मौका दिया जाएगा।
एलसीडी की पूछ-परख ज्यादा
कचहरी चौक स्थित यूनिवर्सल सर्विस दुकान के संचालक गौरव डागा ने बताया कि वर्ल्डकप को देखते हुए सभी सामानों पर काफी छूट दी जा रही है। लोगों का वर्ल्डकप के लिए कितना क्रेज है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुकानों में प्रत्येक दिन दस से पंद्रह लोग आकर एलसीडी के बारे में जानकारी ले रहे हैं। दुकान में सेमसंग, सोनी, एलजी व अन्य ब्रांडेड कम्पनियों के टीवी, एलसीडी उपलब्ध हैं। खास वर्ल्डकप को देखते हुए सभी कम्पनियों के एलसीडी व एलईडी के दामों में दो से तीन हजार रुपए कम किए गए हैं। वहीं सेमसंग के साथ डिशटीवी, सोनी के साथ एयरटेल, एलजी के साथ एयरटेल का डीटीएच फ्री दिया जा रहा है।

जरा इन बातो पर ध्यान दे

शेखर झा
कुछ विचित्र सी खबरें पढ़ने को मिलती हैं। खबर यह होती है कि अमूक विद्यार्थी ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे अच्छी अँगरेजी नहीं आती थी। यह भी खबर पढ़ने को मिलती है कि उसने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसकी प्रेमिका ने उसे ठुकरा दिया या प्रेमी से उसकी शादी नहीं हो सकी। यह पढ़कर न केवल गहरा दुःख होता है, बल्कि धक्का सा पहुँचता है।
दुःख इसलिए होता है कि एक ऐसा जीवन जिसे इस धरती ने अपनी गोद में 18-20 साल रखा। जिसे प्रकृति ने अपनी हवा, पानी और रोशनी से पाला-पोसा, वह यूँ ही एक मिनट में इन सबको ठुकराकर इतना अधिक निर्दयी बनाकर एक मिनट में चलता बना। वह कुछ बनकर इस धरती को और बेहतर बनाने में जो अपना योगदान दे सकता था, उस संभावना को उसने अपने जीवन की समाप्ति के साथ ही समाप्त कर दिया। धक्का मुझे इसलिए लगता है कि मैं सोचता हूँ कि क्या इतने अमूल्य, इतने महत्वपूर्ण और इतने असाधारण जीवन को ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिए खत्म कर दिया जाना चाहिए? कम से कम मैं तो इससे इत्तफाक नहीं रख पाता। हो सकता है कि मेरी इस बात से मेरे युवा साथी सहमत न हों, क्योंकि उन्हें प्रेम की सफलता और असफलता जिंदगी की एक बहुत बड़ी बात मालूम पड़ती है। इसलिए वे इसके लिए मरने और मारने की बात को एक प्रकार से अपने अस्तित्व से ही जोड़कर देखने लगते हैं।
उन्हें लगता है कि यदि प्रेम ही नहीं रह गया तो जिंदगी के रहने का अर्थ ही क्या है। और समाज में ऐसे भावुक युवा प्रेमियों को समझा पाना इतना आसान भी नहीं होता। ऐसे कई लोगों से मेरा साबका पड़ा है और मैंने समझाने की इस परेशानी को झेला भी है। मैंने पाया है कि उनके सारे सच के केंद्र में उनकी अतिरिक्त भावुकता होती है।
यदि उनकी इस भावुकता पर तार्किकता की थोड़ी सी भी लगाम कसी जा सके तो ऐसी न जाने कितनी जिंदगियों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। यहाँ तक कि बहुत सी ऐसी भी जिंदगियाँ होती हैं, जो नष्ट तो नहीं होती, लेकिन अपने उस खोए हुए प्यार को अपने दिल में दबाए हुए अपने लिए लगातार बर्बादी के रास्ते तलाशती रहती है। ये जितना बेहतर जीवन जी सकते थे, अपने-आपको उस बेहतर जीवन से वंचित कर लेते हैं।

मित्रों सातवें दशक के एक बहुत खूबसूरत फिल्मी गीत की पंक्तियाँ हैं-
छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
यह मुनासिब नहीं जिंदगी के लिए।
प्यार से भी जरूरी कई काम हैं
प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए।


प्यार बहुत कुछ तो हो सकता है, लेकिन सब कुछ कतई नहीं। और यदि सच पूछिए तो प्रेम केवल तभी तक प्रेम रहता है, जब तक कि वह आपको मिलता नहीं। जैसे ही प्रेम मिल जाता है, यानी कि प्रेमिका पत्नी और प्रेमी पति बन जाता है, जैसे ही प्रेम उड़न-छू हो जाता है। स्पष्ट है कि जब प्रेमी प्रेमी नहीं रहा और प्रेमिका प्रेमिका नहीं रही, तो फिर भला प्रेम ही प्रेम कैसे रह सकता है। मैं जानता हूँ कि मेरी इस बात पर सौ प्रश प्रेम-प्रेमिका भरोसा नहीं करेंगे, क्योंकि इस पर भरोसा करने के लिए अनुभव की जरूरत होती है और यदि एक बार अनुभ वहो जाए तो फिर आप भरोसा करें या न करें उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इसलिए फिलहाल तो मैं अपने युवा मित्रों से यही कह सकता हूँ कि कृपया यकीन करें। साथ ही एक बात और। जिंदगी के किसी भी क्षेत्र की सफलता का परिणाम आप अपने जीवन के अंत में क्यों ढ़ूँढते हैं? आपको लगता होगा कि यह जिंदगी आपकी है और आप इसके साथ जैसा चाहें, बर्ताव कर सकते हैं।
यदि आप ऐसा सोचते हैं कि जो गलत सोचते हैं, क्योंकि यह जिंदगी आपकी होकर भी आपकी नहीं है। यह ईश्वर और प्रकृति के द्वारा आपके पास रखी गई एक धरोहर मात्र है। आप इसके केवल रखवाले भर हैं। जिस तरह एक चौकीदार उस घर का मालिक नहीं हो जाता जिसकी वह रखवाली कर रहा है, उसी तरह आप भी अपने शरीर के मालिक नहीं है, जिसको आप पाल-पोस रहे हैं। आपके माँ-बाप ने इसको तैयार किया है और पूरी प्रकृति और पूरा समाज मिलकर इसके अस्तित्व को बनाए रखने में इसकी मदद कर रहा है। इसलिए किसी व्यक्ति को यह अधिकारी नहीं होता कि वह ईश्वर की इस धरोहर को नष्ट कर दे।
मित्रों जीवन में कभी ऐसा नहीं होता कि रास्ते खत्म हो जाते हैं। रास्ते खत्म नहीं होते; हाँ, वे मुड़ सकते हैं। बड़े रास्ते छोटी पगडंडियाँ बन सकती हैं। लेकिन वे मरती कभी नहीं। जिंदगी हमेशा संभावनाओं से भरा हुआ एक विशाल कर्मक्षेत्र होता है जहाँ एक दरवाजा बंद होने पर सौ दरवाजे खुलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
आपको करना केवल यह होता है कि अपने आँखों के आँसुओं को पोंछकर आँखें उठाकर आशा भरी नजरों से क्षितिज को निहारना होता है और आपके देखते ही देखते न जाने कितने दरवाजे उन्मुक्त हो जाते हैं। इसलिए उदास, निराश और हताश होने की कोई जरूरत ही नहीं होती।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

क्यूट सी गर्लफ्रेंड को क्यूट सा गिफ्ट




वेलेंटाइन-डे को खास बनाने के लिए युवाओं ने प्लानिंग शुरु कर दी है। इसमें सबसे इम्पोर्टेंट होता ही अपने खास के लिए गिफ्ट खरीदना। फ्लावर्स, चॉकलेट्स और कोई आर्टिफिशियल चीजों की लिस्ट में एक नाम और शामिल हो गया है और वो है ‘पपी’। जी हां! सुनकर आश्चर्य हुआ न मगर ये सच है राजधानी में खास वेलेंटाइन-डे के लिए लोग डॉग्स परचेज कर रहे हैं। इन पपी की कीमत भी तीन हजार से शुरु होकर पचास हजार तक है।
शेखर झा
प्यार के दिन को खास बनाने के लिए यूथ्स बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। अपनी गर्लफ्रैंड को या अपने बॉयफै्रं ड को ऐसा क्या दूं कि बस उसके लिए ये दिन खास बन जाए। कुछ इसी सोच के चलते इन दिनों यूथ्स गिफ्ट्स के आप्शन की तलाश में हैं। इनमें से कुछेक ने तो इस वेलेंटाइन-डे पर अपने अजीज को पपी देने की ही प्लानिंग कर डाली है। वहीं कुछ लोगों ने तो खरीदकर ले जाना भी शुरु कर दिया है। कटोरातालाब चौक स्थित कमांडो डॉग दुकान में इन दिनों पपी की तलाश में लोगों का आना-जाना लगा हुआ है। इसमें बॉयफ्रैंड खास अपनी गर्लफ्रैंड के लिए पामोलियन नस्ल का डॉग (पपी) खरीद रहे हैं। इस किस्म के डॉग की कीमत 3 हजार से शुरु है।
पपी की पूछपरख ज्यादा
कटोरातालाब स्थित कमांडो डॉग दुकान के संचालक सैफ खान ने बताया कि वैलेंटाइन के आने से पहले ही लोग गिफ्ट के लिए पपी देखने के लिए आने लगे हैं। खास वेलेंटाइन-डे को देखते हुए कहा जाए तो रोजाना दो, तीन पपी की बिक्री हो ही जाती है। सबसे ज्यादा व्हाइट कलर वाले पपी खरीदे जा रहे हैं। इन पपी के खरीदार सिर्फ शहर में ही नहीं बल्कि जगदलपुर, कांकेर, चारामा व उड़ीसा तक में हैं। यहां से भी इन पपी की डिमांड आती है। जो लोग इन पपीज को खरीद रहे हैं उनका कहना है कि वेलेंटाइन पर गुलाब फूल, चॉकलेट देने से अच्छा है कि कुछ ऐसी चीज दें कि वो हमेशा याद रहे।
विदेशी नस्ल के डॉग भी
सैफ खान बताते हंै कि दुकान में देश के साथ विदेशी नस्ल के डॉग भी हैं। ये सभी डॉग्स चेन्नई, बैंग्लोर, कलकत्ता, हैदराबाद, दिल्ली व जयपुर के साथ मास्को व साउथ अफ्रीका से मंगवाए जाते हैं। दुकान में पामोलियन, जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर, कॉकर स्पेनियर, रॉट विलर, ग्रेग डन, गोल्डन रिटेवर, बूल मैस्टिक, सेंट ब्रनाड व अन्य नस्लों के डॉग उपलब्ध हैं। इस सभी नस्लों में से सबसे ज्यादा लोग पामोलियन, लेब्राडोर, जर्मन शेफर्ड के पपी की खरीदी कर रहे हैं।
वेलेंटाइन छूट भी
वेलेंटाइन डे को देखते हुए हमारी दुकान की ओर से इन डॉग्स की खरीदी पर दस फीसदी की छूट दी जा रही है। सैफ खान ने बताया कि वैलेंटाइन डे में किसी के द्वारा डॉग का जोड़ा खरीदा जाता है, तब उन्हें दस फीसदी छूट दी जा रही है। उन्होंने बताया कि जिनके द्वारा डॉग की खरीदी की जाती है उनके घर जाकर डॉग को तीन महीने की टेÑनिंग भी दिए जाने की सुविधा दी जा रही है। ट्रेनिंग दिए जाने का उनके द्वारा अलग से दाम किया जाता है। वैलेंटाइन डे को देखते हुए एक दिन में कम से कम दो से तीन डॉग की बिक्री हो जा रही है।

रविवार, 30 जनवरी 2011

सबसे ज्यादा प्लानर डायरी खरीद


शेखर झा
कुछ साल पहले लोगों का डायरी खरीदने के लिए काफी रुझान हुआ करता था मगर विगत कुछ सालों से लोगों का इसके लिए इंटरेस्ट कम हुआ है। कंप्यूटर, लेपटॉप, नोट पेड जैसे डिवाइस के चलते अब लोग डायरी खरीदना कम ही पसंद करते हैं। इसके बावजूद भी वर्तमान समय में लोगों के द्वारा डायरी की खरीदी की जा रही है। शहर की स्टेशनरी दुकानो में लॉ डायरी, डेली डयरी, नोट डायरी, फैंसी डायरी, फ्लावर डायरी, प्लानर डायरी, लॉक डायरी, डिजायनिंग डायरी आदि उपलब्ध हैं।
प्लानर डायरी की खरीदी ज्यादा
गोल बाजार स्थित नूरी स्टेशनरी दुकान के संचालक मोहम्मद साहिल बताते हैं कि लोगों के पास नोटपेड व लेपटॉप होने के बाद भी वो आज भी डायरी खरीदना पसंद करते हैं। आज भी लोग बड़ी व छोटी दोनों तरह की डायरी खरीदना पसंद करते हैं। आज भी लोगों को कुछ लिखना रहता है तो वो डायरी में ही नोट करना ज्यादा उचित समझते हैं। दुकानों में कई तरह की डायरी उपलब्ध हैं। लोग सबसे ज्यादा प्लानर डायरी खरीद रहे हैं। मार्केट में कम रेंज से लेकर हजार रुपए तक की डायरियां उपलब्ध हैं।
नोटपैड वाली डायरी
मालवीय रोड स्थित कुसमुद्दीन स्टेशनरी दुकान के संचालक रिजवी तनवीर ने बताया कि वर्तमान समय में कॉजेल के स्टूडेंट्स के द्वारा सबसे ज्यादा नोट पेड वाली डायरी की खरीदी की जाती है। इसके अलावा युवा वर्ग डायरी को अपने दोस्त के जन्मदिन पर या किसी अन्य अवसर पर इसे बतौर गिफ्ट देना पसंद करता है। वर्तमान समय में हमारी दुकान में लोगों के लिए कानूनी डायरी, पॉकेट डायरी, बटन डायरी, लॉक डायरी, सिम्पल डायरी, डिजाइनिंग डायरी, एक्जीक्यूटिव डायरी व अन्य प्रकार की डायरियां उपलब्ध हैं। वर्तमान समय में डायरी का यूज लिखने में कम और गिफ्ट देने में ज्यादा हो रहा है। टेलिफोन डायरी की डिमांड स्टूडेंट्स से लेकर आॅफिसर तक के पास है। मोबाइल में इतना इस्पेस नहीं होता है कि ज्यादा नम्बर सेव किए जाएं, इस कारण से भी अधिकांश लोग डायरी खरीदने में ही विश्वास करते हैं। इसलिए टेलीफोन डायरी को आज भी खरीदा जा रहा है।

कस्टमर को लुभाती छुट


शेखर झा
किसी सामान पर छूट मिलती है तो लोग उस सामान कोई काफी संख्या में खरीदी करते है। वर्तमान समय में शहर के ब्रांडेड व नॉन ब्रांडेड गारमेंट दुकानों में सभी प्रकार के कपड़ों को छूट दिया जा रहा है। छूठ के चलते दुकानों में लोगों की काफी संख्या में भीड़ देखने को मिलती रही है। वैसे तो गारमेंट दुकानों में फेस्टिवल में छूट दी जाती है मगर सीजन के लास्ट में भी दुकानदारों के द्वारा छूट दिया जा रहा है। दुकानदारों का मानना है कि वर्तमान समय में कमपीटिशन का दौर है। इस दौर में जो दुकान वाले के यहां जितनी छूट रहती है उतनी ही कस्मरों की भी उनके दुकान में देखने को मिलती हैं। कपड़ों पर छूट देने से ग्राहको से एक तरह से लूभाया जाता है। उन्होने बताया कि साल कपड़ो में समर सीजन व विंटर सीजन में छूट दिया जाता है। उसके चलते दुकानों में लोगों की काफी मात्रा में भीड़ देखने को मिलती है।
जितनी छूट, उतनी भीड़
बात तो सही है कपड़ों पर जितनी छूट रहेगी, लोगों की उतनी भीड़ दुकानों में देखने को मिलेगी। लाखेनगर स्थित शुर्भी साड़ी संसार दुकान के संचालक मनोज देवनानी ने बताया कि वर्तमान समय में लोग कम दामों में अच्छे सामान की खरीदी करना ज्यादा पसंद करते हंै। उनकी दुकान में चार्ली आउटला ब्रांड के कपड़े भी उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि इस वक्त शहर की अधिकतर दुकान में सामान की छूट मिल रही है। वर्तमान समय में सभी कपड़ों व जींस पर 70 से लेक र 80 फीसदी तक छूट दी जा रही है। सभी दुकानदार चाहते हंै कि ग्राहकों की भीड़ सबसे ज्यादा उनकी ही दुकान में रहे। इसके चलते ही कंपनी की छूट के साथ कई बार दुकानदार भी अपनी तरफ से सामान पर छूट देते हंै। उस छूट के चलते दुकानों में लोगों की काफी भीड़ देखने को मिलती है। हमारी दुकान में बच्चे व लेडीज कपड़ों के सामान पर भी 10 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक की छूट दी जा रही है।
छूट का आधार
गोदाम में सामान का स्टॉक ज्यादा होने के चलते या फेस्टिवल के चलते सामान पर छूट दी जाती है। वर्तमान समय में युवाओं के द्वारा काफी स्टाइलिश कपड़ों की खरीदी की जाती है। दुकानदारों का कहना है कि जब किसी मौसम सीजन खत्म होने को होता है तब छूट दी जाती है। छूट देने के चलते सामान की भी बिक्री हो जाती है। महंगाई के चलते वर्तमान समय में सभी चीजों के दाम काफ भी बढ़ गए हैं। कितने लोग ऐसे भी होते हंै जो दुकान में छूट देखकर आते हैं और काफी संख्या में सामान की खरीदी भी करते हंै।
सीजन के लास्ट में छूट
आमापारा चौक स्थित वुडलेंड शोरुम के मेनेजर रिक्की टी एस ने बताया कि शोरुम में शर्ट, जींस के अलावा सीजन वाले कपड़े शामिल हंै। गारमेंट्स पर 40 फीसदी व फुटवेअर पर अपटू 50 फीसदी तक का डिस्काउंट दिया जा रहा है। विंटर सीजन खत्म होने वाला है इसलिए स्वेटर, जैकट व विंटर सीजन वाले कपड़ों पर छूट दी जा रही है। इसके चलते भी छूट दी जा रही है। बिना छूट के अक्सर ब्रांडेड सामान इतने मंहगें होते हैं जिनकी खरीदारी कर पाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता है।

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

मुन्नी शीला नहीं, बात हो राजनीतिक की


भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति इरानी महिला आयोग से बेहद खफा हैं और मानती हैं कि यह तरीके से काम नहीं कर रहा है।
मनीष सिंह
भाजपा महिला मोर्चा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में शिरकत करने आई मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति ईरानी ने रविवार दोपहर पत्रकारों से रुबरु होकर कहा कि लोग मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी नहीं देखें। जनता से आग्रह से है कि वे ऐसी फिल्मों से परहेज करें। वे •ाी यहां इन मुद्दों को लेकर नहीं आई हैं, बल्कि राजनीतिक चर्चा करने आई हैं।
दोनों गानों पर प्रतिबंध के सवाल को वे टाल गर्इं। श्रीमती ईरानी का मानना है कि परिवार ही बच्चे को संस्कार देता है। उन्हें क्या दिखाना है, क्या पढ़ाना है, यह हमारी जिम्मेदारी है। टेलिविजन चैनलों पर अश्लीलता रोकने के लिए उन्होंने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी को चिट्ठी लिखी है। इसमें उन्होंने हर चैनल से कोड आॅफ कंडक्ट बनवाने कहा है। मंत्रालय ने उनकी चिट्ठी को तवज्जो नहीं दी। मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष महिला आयोग पर जमकर बरसीं। उन्होंने आयोग पर अपने अधिकारों का ठीक तरीके से उपयोग नहीं करने का आरोप लगाया। बांदा रेप केस एवं इंग्लैण्ड में भारतीय राजदूत द्वारा पत्नी को प्रताड़ित करने के मामले पर आयोग की चुप्पी की आलोचना की। श्रीमती ईरानी ने बताया कि बांदा जाकर उनकी टीम पीड़ित लड़की से मिलीं एवं आंदोलन कर पुलिस अफसरों को सस्पेंड कराया। बिहार के रुपम पाठक मामले के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे फिलहाल वहां नहीं गर्इं हैं। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मामले की निष्पक्ष जांच करवा रहे हैं। लिहाजा उन्होंने वहां जाना मुनासिब नहीं समझा।
हर बूथ में एक महिला
श्रीमती ईरानी ने कहा कि मोर्चा ने बूथ लेवल तक अपनी पकड़ मजबूत करने का प्लान बनाया है। हर बूथ में मोर्चा की एक सदस्य की तैनाती होगी, जिससे सरकार की उपलब्धियां एवं नीतियां ग्रासरुट लेवल तक पहुंचे। ग्रासरुट लेवल की महिलाओं को मोर्चा से जोड़ने का काफी प्लान है।
भरष्टाचार पर वार
वे महंगाई, महिला आरक्षण बिल एवं भरष्टाचार पर केंद्र पर खूब बरसीं। सरगुजा एवं बस्तर इलाके की आदिवासी लड़कियों की अवैध ट्रैफिकिंग के सवाल में वे उलझ गई। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी बात की खबर नहीं।
महिलाओं की तरक्की
श्रीमती ईरानी ने पार्टी की कुछ महिला नेताओं का नाम गिनाते हुए इसे तरक्की का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि आदिवासी इलाकों में महिलाओं की बेहतरी के लिए मोर्चा काफी कु२छ कर रहा है। कार्यसमिति की बैठक में आर्इं झारखंड की आशा लकड़ा ने आदिवासी महिलाओं की तरक्की में बहुत योगदान दिया है।

प्यारा नाम, हुआ बदनाम



रमेश श्रीवास्तव

कितना प्यारा नाम है शीला और मुन्नी लेकिन आज कल मनचलों की जुबान इस नाम से घिस रही है.समाज में इन दो नामों शीला और मुन्नी पर जंग और बहस छिड़ती नजर आ रही है. शीला और मुन्नी की महिलाएं और लड़कियां दुबककर बैठ गई हैं, क्योंकि उन्हें देखकर सहेलियां या शरारती लड़के गाना शुरू कर दे रहे हैं पूरब ने कभी सोचा ही नहीं था कि हमारी प्यारी मुन्नी आगे चलकर बदनाम हो जाएगी. शीला पर लोग अपनी गलत नजर रखेंगे. बड़े-बुजुर्ग लड़कियों को प्यार से बचपन में मुन्नी और शीला कहकर बुलाते हैं. आगे चलकर वही नाम हो जाता था. आज यही नाम फिल्म जगत से निकलकर गलियों सड़कों पर बदनाम चल पड़ा है.दबंग में मलाइका ने ह्यमुन्नी बदनाम हुई गाने पर डांस किया है. वहीं फिल्म ह्यतीस मार खांह्ण में कैटरीना कैफ ने शीला की जवानी पर अपना जलवा बिखेरा है. आज कल दो आइटम सांग ह्यमुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी की धूम मची हुई है. हर तरफ यही दो गाने सुनाई दे रहे हैं. लेकिन गानों को लेकर महिलाओं के एक तबके में खासी नाराजगी है.कई महिला संगठनों ने इन गानों पर रोक लगाने की मांग की है. एनसीआर के नोएडा शहर में इन गानों को रुकवाने के लिए ज़ोरदार प्रदर्शन किया. ऐसे गानों से किसी को परेशानी हो तो सवाल उठना लाज़मी है. पाटिर्यों में शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी छा गई है. लोग इस पर थिरकते हुए नजर आ रहे हैं. मुन्नी और शीला के गाने पर रोक लगाने के लिए बंबई हाई कोर्ट के बाद वाराणसी की एक स्थानीय अदालत और इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इनके खिलाफ याचिका तक दायर की जा चुकी है. महिलाओं का आरोप है कि शीला और मु्न्नी नाम की महिलाओं को इससे काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है. मनचले उन्हें छेड़ने के लिए इन गानों का इस्तेमाल कर रहे हैं. वैसे फिल्मी गानों में महिलाओं के नामों का इस्तेमाल पहले भी होता रहा है. फिल्म दबंग और तीस मार खां में मुन्नी और शीला को जिस रूप में पेश किया गया है, उस पर असल आपत्ति यही है. समाज वास्तविक मुन्नियों और शीलाओं को उसी रूप में देखने लगा है. मप्र की अदालत ने फिल्म दबंग के गाने ह्यमुन्नी बदनाम हुई अश्लील करार दिया. तीन मनचलों ने मुन्नी नाम की एक लड़की को इस गीत को गाकर छेड़खानी की. लड़की की शिकायत के बाद मामला अदालत पहुंचा, जहां तीनों की अंतरिम जमानत की अर्जी को कोर्ट ने खारिज कर दिया. वाराणसी में तीस मार खां फिल्म के गाने ला की जवानी का जमकर विरोध किया गया. स्थानीय अदालत में इस गाने को फिल्म से हटाने के लिए याचिका दायर की गई थी पर अभी तक उस पर कोई भी फैसला नहीं आया.दनकौर के निकट राजपुरकलां गांव में एक समारोह के दौरान शीला की जवानी गाना बजने पर दो पड़ोसियों में जमकर मारपीट भी हो चुकी है लोगों के मुताबिक शीला एक साधाराण नाम है जो हर दूसरी महिला या लड़की का होता है. इस गाने पर लड़कों ने लड़कियों को छेड़ना शुरू कर दिया है. इस अभद्र शब्द को गाने से हटा दिया जाए या फिर पूरा गाना ही फिल्म से हटा दिया जाए. वैसे इससे पहले फिल्म त्रिदेव के ओए-ओए गीत ने धूम मचाया था. फिल्म सौदागर का इलु-इलु भी मनचलों के लिए छेड़छाड़ का जरिया बन गया था. शीला और मुन्नी को लेकर गाने बनाने वालों को चाहे जितनी ही शोहरत और आमदनी हुई हो लेकिन ये गाने उन महिलाओं के लिए आफत बन गए हैं जिनके नाम शीला या मुन्नी है. गाने से अलग अच्छी शुरुआत के बावजूद फिल्म तीस मार खां ने बाक्स आफिस पर दम तोड़ना शुरू कर दिया है. इस बात से फराह को काफी निराशा पहुंची है. शीला और मुन्नी गाने का लफड़ा बढ़ता ही जा रहा है. देखिए आगे क्या गुल खिलाएगा.

सोमवार, 24 जनवरी 2011

कटरीना और प्रियंका के घर इनकम टैक्स का छापा



बॉलिवुड ऐक्ट्रेस कटरीना कैफ और प्रियंका चोपड़ा के घरों पर सोमवार सुबह इनकम टैक्स अधिकारियों ने छापे मारे। टीवी चैनल की रिपोर्ट्स के मुताबिक इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों कटरीना और प्रियंका चोपड़ा के घर पर सोमवार सुबह करीब 7.30 बजे छापे मारे। सूत्रों के मुताबिक दोनों ऐक्ट्रेसेज ने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय गलत जानकारी दी थी और वास्तविक इनकम के बारे में भी उचित जानकारी नहीं दी। इनकम टैक्स के अधिकारी दोनों ऐक्ट्रेसेज के मैनेजरों से भी पूछताछ करेंगे। छापेमारी खत्म होने के बाद ही मामले की पूरी जानकारी मिल पाएगी।

रविवार, 23 जनवरी 2011

लता दीदी का बचपन



लता जब महज पांच वर्ष की थी, तब चेचक की शिकार हो गई। चेचक का हमला इतना भारी था कि हर किसी को आशंका थी कि वह चल बसेगी या फिर चेहरा कुरूप हो जाएगा। जब मां उसे लोरियां सुनाती तो रोती-कलपती बच्ची अकसर उनका साथ देती थी
हरिशरन शुक्ल

लता का जन्म 28 सितम्बर, 1929 को हुआ। गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर की पत्नी गायिका नमर्दा मंगेशकर ने कन्या के रूप में गायन क्षेत्र के इतिहास लता को जन्म दिया। जब वह पांच वर्ष की थी, तब चेचक की शिकार हो गई। चेचक का हमला इतना भारी था कि हर किसी को आशंका थी कि वह चल बसेगी या फिर चेहरा कुरूप हो जाएगा। जब मां उसे लोरियां सुनाती तो रोती-कलपती बच्ची अकसर उनका साथ देती थी। उनका चेहरा इतना सूज गया कि एक कौर भी निगलने में दिक्कत होती थी। इसलिए बूंद- बूंद दूध पिलाया जाता था। वह रोती रहती। डॉक्टर को उसकी आंखों की रोशनी जाने का डर था। इस भयंकर बीमारी की चपेट में वह पूरे तीन महीने रही। इसके बाद, जब लता की आंखें फिर से सब कुछ देखने लगीं और उसकी आवाज सलामत रही तो पिता ने स्थानीय बाजे वाले को बुलाया। मां ने अनाज-नारियल और महंगी साड़ियां शगुन के तौर पर बांटी और बेटी का पुनर्जन्म मनाया। अब लता के पिता उसे दोगुने उत्साह से संगीत सिखाने लगे लेकिन अकसर नाटक के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता था। उन्हें यह भी अहसास नहीं हुआ कि उनकी बेटी ने कितना संगीत सीख लिया और वह भी अपने बूते पर। स्टेज पर लता का पहली बार उतरना महज संयोग ही था। लता जब करीब सात वर्ष की थीं तब उसके पिता पूरे परिवार को मनमाड ले गए। वहां सौभद्र का मंचन होना था। नारद की भूमिका निभाने वाला कलाकार प्रदर्शन के पहले बीमार पड़ गया। घबराहट फैल गई लेकिन शांतचित्त लता ने अपने घबराए पिता से कहा, ह्णचिंता मत कीजिए बाबा। मैं, मां और भाई के साथ चारों बहनें नारद की भूमिका निभाऊंगी। मुझे सारे गाने याद हैं, संवाद भी याद है। बेटी के आग्रह को दीनानाथ ने गंभीरता से लिया क्योंकि उसके हावभाव से उन्हें आशा की किरण दिखाई दी। फिर भी एक समस्या थी। अजरुन (दीनानाथ) की भूमिका करने वाला नायक 36 साल का था जबकि नारद सिर्फ सात साल का था। अब फैसला करना था। परदा उठा और छोटा-सा नारद मंच पर आया, अनुभवी कलाकार की जगह एक बच्चे को देखकर दशर्कों के बीच आशंका की लहर दौड़ गई। मास्टर दीनानाथ भी पर्दे पर उत्सुकता से देख रहे थे। हारमोनियम वादक ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ सुर भरे। उसे कैसे पता चलता कि इसी संकेत का तो लता इंतजार कर रही है। छोटे नारद ने अपने होंठ हिलाए और स्वाभाविक रूप से शब्द, सुर और लय पूरी त्कग््रफ२कित्कक के साथ दृश्य की मांग के अनुरूप फूटे। दर्शक अवाक रह गए और जोरदार तालियां बजीं। 42 वर्ष की उम्र में पिता दीनानाथ चल बसे। इसके बाद परिवार विपत्तियों में फंस गया। पिता के साथ काम करने वालों या किसी अन्य ने लता के परिवार की सुध नहीं ली। लता का परिवार 12 से 14 घंटे कड़ी मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से दो समय की रोटी जुटा पाता था। ऐसे विख्यात पिता की याद में उनकी बरसी पर संगीत का कोई कार्यक्रम करना असंभव लग रहा था। आखिरकार, अनुभवहीन मां और 15 बरस की लता ने यह जिम्मेदारी अपने ही कंधों पर उठाने का फैसला किया और स्मृति समारोह कोल्हापुर के पैलेस थियेटर में हुआ। इस समारोह में अनेक जाने-माने संगीतकार आए। लता ने पिता की तस्वीर को पुष्पहार पहनाया, तानपुरा उठाया और तुरंत ही संगीत के उन सुरों में खो गई जो उसने सीख-सृजित किए थे। उस रात घर लौटने के बाद मां ने उसे प्यार से झिड़का, गाते समय तुम्हारे चेहरे पर तनाव था। तुम्हारे बाबा कभी ऐसा नहीं करते थे। दूसरी पुण्यतिथि पर गाते समय लता के चेहरे पर किसी तरह का तनाव नहीं था।