गुरुवार, 3 मार्च 2011

जानना क्यों नहीं चाहते



प्रदीप कुशवाहा

वह सुनसान रास्ता, रात का समय झिंगुर की आती आवाज़ मन में थोड़ा डर, समय था आधी रात का जहां नज़रों को आगे दौडाने पर भी कोई नहीं दिखता, दिखते तो सिर्फ गली में दो-चार श्वान, जिनका भयावह आवाज सिर्फ कानो में आते एक के भौंकने के बाद कुद्द दूर-दूसरे कुत्ते की आहट मानो ऐसा लगता कि ये कुत्ते रात में संत्री हो, जो एक दूसरे को आगाह कर रहे हो। अभी रात काटने में 4 घंटे बचे थे, इन्तजार था तो सिर्फ सुबह का इस रात को काटते समय हम चार दोस्त बैठे थे, एक अनजान गांव में जहां हम गये थे अपने पढ़ाई के विषय में शोध करने शोध हमारे विषय की विशेषता थी क्योंकि हम मीडिया के स्टुडेंट थे। वैसे यह किसी शोध के विषय के बारे मे मैं लेख नही लिख रहा हूं लेख बस उस गांव के ऊपर है जहां हम गये हुए थे। रात का पल तो हमने आपस में बात कर के काट ली सभी अपने जीवन में अभी तक घटे घटनाओं के बारे मे बात कर रहे थे कई ने मजाक किया किसी के बातों के लेकर एक-दूसरे को खुब चिढ़ाया, धीरे-धीरे रात गुज़र गई हमें उस रात नींद भी नही आ रही थी वैसे विधाता का शुक्रिया की उस रात नींद नही आई अन्यथा उस पल को मैं कैसे याद रख पाता। सवेरा हुआ आंख-मुंह धोए और नास्ता किया, उसके बाद निकल गये गांव में भ्रमड करने सभी ने अपने अपने विषय के बारे में अध्ययन किया। पर मेरी इच्छा क्या थी मैं खुद नही समझ पा रहा था। जानता तो था, कि मै कुछ अलग करू मेरे मन में कुछ ऐसा करने का कौतुहल था जो मुझे मेरे मन को शुकुन दे। मै उस गांव के बारे में बड़ी बारिकी से जानने का प्रयास किया यहां की हर एक गली को हर एक व्यक्ति को हर खेत की मेंड को समझना चाहता था उस रात को अपने दिल में बसाना चाहता था, एक नदी के बहते धारा को आंखो में देखना वाहता था, सुबह की खिली धुप को महसूस करना चाहता था।
हर शाम की मजबूरी को जानना चाहता था। इन सभी यादों को दिल में बसाना चाहता था, पता नहीं ऐ कैसा कतूहल था। आगे चलते समय मुझे एक कुआं दिखा। कुएं के अंदर देखा तो वह बहुत गहरा था, वहां दो औरतें भी थी, जो हमें अजीब नजरों से दिख रही थी। शायद हमारे पहनावे को क्योंकि हमने नेरो लोवेस्ट जींस व भड़किले कपड़े जो पहने थे। जो शायद गांव की सादगी को चिढ़ा रही थी। हमने वहां से राह बदला और आगे की ओर चल दिए। मैने देखा कई बच्चें नंगे पांव मैले कपड़े पहने, धूल में खेल रहे थे। कई के नाक बह रहे थे, किसी के हाथों में साइकिल के टायर व डंडे थे। पता नहीं मेरा ध्यान उन पर क्यों गया। मेरे साथ जो दोस्त थे, उनका ध्यान क्यों नहीं गया। मैंने अपने मोबाइल से उनका एक फोटो खींच लिया। इन बच्चों को देख मन को असंतोष हुई, क्योंकि यही तो हैं वह बालू का जर्रा जिन्हें कहीं न कहीं आकाश में चमकना होगा। आज का व्यक्ति सिर्फ खुद को जानते हैं। इसका सच्चा उदाहरण हमें एक होटल में मिला। हम सभी इस होटल में चाय पीने गए थे। हमने चाय मगवाया और चाय पीया, पैसा दिया और चलते बने। सभी ने यही किया, क्योंकि उन्हें सिर्फ चाय पीना था। किसी ने भी यह ध्यान नहीं दिया कि चाय का प्याला किसने लाया, किसने उठाया। कौन था जो टेबलों पर पौंछा लगा रहा था, प्लेट और कप कौन धो रहा था। इस बात पर किसी का ध्यान नहीं गया, क्यों?मुझे बहुत अफसोस हुआ, किसी को तो सोचना था। मेरे मन में यह ख्याल कैसे आया, कहां से आया, मैं नहीं जानता। आज नंगे पैर पीठ पर बोरा लटकाए, कचरे के ढेरों पर रद्दी तलाशते ये बच्चें, कप-प्लेट धोते यह बाल मजबूर, इनकी लाचारी और मजबूरी क्या है। ये खूद नहीं जानते। हम कितना भी कठोर क्यों न हो जाएं, क्या ऐसे स्थिति देखकर हमारा स्वार्थी मन नहीं पसीजता। औरों का तो पता नहीं, पर मुझे बहुत दर्द हुआ, मैं कर भी क्या सकता हूं, अपनी संवेदनाओं को प्रकट करने के अलावा। आज की ये रईस भूमि पुत्र अपने आप को आसमान में देखना चाहते है। तभी तो लोग आज कुत्ते पालने में ज्यादा सौंक रखते है।दिन बीत गया शाम का समय था। थके-हारे मेरा मन उदास था, चरवाहे मवेशियों को घर ला रहे थे। सभी घरों में खाना बनाने के तैयारी हो रही थी। खपड़ों के ऊपर से धूंए निकल रहे थे। बुर्जूग लोग घरों के आंगन में बैठे आराम कर रहे थे। ग्रामीण युवा वर्ग चौक-चौराहों व नलकूपों के पास खड़े होकर बातें कर रहे थे। जीवन का असली आनंद ग्रामीण जीवन को सोचकर मिलती है। जैसी मैं सोच रहा हूं। खेतों में फसल का लहलहाना, बरसात में लोगों का रोपा लगाना, किसानों का खेतों में बैलों के साथ हल चालना, यह सभी सोचने पर मन शांत व दिल को सुकून मिलता है। लेकिन इन सभी सोच के पीछे एक उदासी भी थी और वह उदासी है एक किसान। किसान खेती करता है, फसल उगाता है और अनाज पैदा करता है और उसे बेचता है सिर्फ 10 रूपए किलो। वही अनाज बाजारों में जाकर उन्हीं किसानों को पचास रूपए में मिलता है। आज एक खिलाड़ी को मैच के दौरान पचास हजार रूपए मिल जाते है और देश के किसानों को सिर्फ दस रूपए। ये सभी ख्याल मेरे मन में क्यू आया। शायद मैं भी तो एक गांव का लड़का हूं।

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