मंगलवार, 22 मार्च 2011

प्रेम कोई प्रायोजित कार्यक्रम नहीं...

दरअसल प्रेम कोई प्रायोजित कार्यक्रम नहीं है, जो चाहने से हो जाए और न चाहने से रुक जाए। प्रेम और स्टॉप वॉच में बहुत फर्क है। ग़ालिब ने सही कहा है कि प्रेम ऐसा आतिशी जज्बात है, जो सप्रयास लगता नहीं है और सप्रयास बुझता नहीं है। यह तो बस, होता है तो हो जाता है। नहीं होता है, तो नहीं होता है।

प्रेम का इतिहास भी इस बात का गवाह है। बरसाने की छोरी ने नंद के लाला को देखा, नंद के लाला ने बरसाने की मोड़ी को देखा और हो गया प्यार, ऐतिहासिक प्यार। राधा की जगह तो रुक्मणी भी नहीं ले सकी। पंजाब के हीर-रांझा और मरुभूमि के लैला-मजनू, शीरी-फरहाद ने चौघड़िया देखकर शुभ मुहरत में प्रेम प्रसंग का शुभारंभ नहीं किया था। मीरा भी पूर्व नियोजित कार्यक्रमानुसार कृष्ण दीवानी नहीं हुई थीं। प्रेम प्रसंग का घटित होना किसी भवन के लिए भूमिपूजन या किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान का शुभारंभ नहीं है।

प्रेम का संबंध अगर दिल से हो, तो वह दुनिया के सारे प्रतिबंधों, सारी वर्जनाओं को ध्वस्त कर देता है। प्रेम ही वह तूफान है जिसमें देश, धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, परंपरा और संस्कृति के किनारे टूट जाते हैं। प्रेम में सिर्फ प्रेम ही प्रेम होता है। जैसे जल प्लावन के पश्चात चहुँदिशी जल ही जल होता है। प्रेम करने वाले सिर्फ मन देखते हैं, मन की भाषा समझते हैं, मन की भाषा बोलते हैं। प्रेम में केवल मन को देखने की भावना की अभिव्यक्ति इस पंक्ति में कितने सुंदर ढंग से की गई है, 'न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन।' प्रेम केवल मन देखता है, तभी तो राजरानी रजिया सुल्तान गुलाम याकूब को अपना दिलदार बना लेती है।

दूसरी ओर अरेंज मैरिज अर्थात प्रायोजित विवाह होते हैं। जिनमें परंपरावादी माता-पिता खुद सामने वालों का घर-बार देख लेते हैं। लेन-देन के सौदे हो जाते हैं। लड़के-लड़की तो एक-दूसरे को तभी देख पाते हैं, जब वे पति-पत्नी घोषित कर दिए जाते हैं। उनका विवाह हो जाता है। दरअसल पारंपरिक प्रायोजित विवाह लड़के-लड़की की कम, समधियों-समधनों की अपनी पसंद ज्यादा होती है। यह लड़के-लड़की का नहीं, माता-पिता की पसंद का विवाह होता है।

लड़के-लडकियों के लिए तो यह विवाह एक लॉटरी है, एक सट्टा है, एक जुआ है, अनुकूल पात्र मिल गया, तो ठीक वरना जिंदगी भर एक-दूसरे को तमाम नापसंदगी, ना इत्तफाकी के साथ कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते किचकिच करते झेलो।

इन लतीफेनुमा वाक्यों को हटा दिया जाए कि 'प्रेम विवाहों में प्रेम पहले हो जाता है, विवाह बाद में, तो विवाह के बाद प्रेम करने की गुंजाइश ही नहीं रहती है।' प्रेम विवाह में पहले प्रेम होता है। विवाहोपरांत प्रेम परवान चढ़ता है। प्रेमी युगल के प्रेम विवाह को माता-पिता की नाक कट जाना समझते हैं। हमें हमारी संस्कृति पर खतरा नजर आता है। समाज व्यवस्था धसकती नजर आती है। इस हाय-तौबा पर कई बार तो ऐसा लगता है कि जो हम नहीं कर पाते हैं, वह दूसरों को करते देखते हैं, तो हमारी ईर्ष्या विरोध बनकर प्रकट होती है।

प्रेम विवाह असफल इसलिए होते हैं, क्योंकि समाज उन्हें हेय दृष्टि से देखता है। माता-पिता अपनी उस संतान की उपेक्षा करते हैं, जिसने प्रेम विवाह किया है। पारंपरिक प्रायोजित विवाह इसलिए सफल (या चल जाते हैं) हो जाते हैं क्योंकि उसे सामाजिक मान्यता मिलती है। एक परिवार दूसरे परिवार के प्रति उत्तरदायित्व समझता है और अलग होने पर लोक निंदा का भय होता है। गरज यह कि प्रेम सहज है, इसे कैसे रोका जा सकता है?

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