रविवार, 23 जनवरी 2011

लता दीदी का बचपन



लता जब महज पांच वर्ष की थी, तब चेचक की शिकार हो गई। चेचक का हमला इतना भारी था कि हर किसी को आशंका थी कि वह चल बसेगी या फिर चेहरा कुरूप हो जाएगा। जब मां उसे लोरियां सुनाती तो रोती-कलपती बच्ची अकसर उनका साथ देती थी
हरिशरन शुक्ल

लता का जन्म 28 सितम्बर, 1929 को हुआ। गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर की पत्नी गायिका नमर्दा मंगेशकर ने कन्या के रूप में गायन क्षेत्र के इतिहास लता को जन्म दिया। जब वह पांच वर्ष की थी, तब चेचक की शिकार हो गई। चेचक का हमला इतना भारी था कि हर किसी को आशंका थी कि वह चल बसेगी या फिर चेहरा कुरूप हो जाएगा। जब मां उसे लोरियां सुनाती तो रोती-कलपती बच्ची अकसर उनका साथ देती थी। उनका चेहरा इतना सूज गया कि एक कौर भी निगलने में दिक्कत होती थी। इसलिए बूंद- बूंद दूध पिलाया जाता था। वह रोती रहती। डॉक्टर को उसकी आंखों की रोशनी जाने का डर था। इस भयंकर बीमारी की चपेट में वह पूरे तीन महीने रही। इसके बाद, जब लता की आंखें फिर से सब कुछ देखने लगीं और उसकी आवाज सलामत रही तो पिता ने स्थानीय बाजे वाले को बुलाया। मां ने अनाज-नारियल और महंगी साड़ियां शगुन के तौर पर बांटी और बेटी का पुनर्जन्म मनाया। अब लता के पिता उसे दोगुने उत्साह से संगीत सिखाने लगे लेकिन अकसर नाटक के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता था। उन्हें यह भी अहसास नहीं हुआ कि उनकी बेटी ने कितना संगीत सीख लिया और वह भी अपने बूते पर। स्टेज पर लता का पहली बार उतरना महज संयोग ही था। लता जब करीब सात वर्ष की थीं तब उसके पिता पूरे परिवार को मनमाड ले गए। वहां सौभद्र का मंचन होना था। नारद की भूमिका निभाने वाला कलाकार प्रदर्शन के पहले बीमार पड़ गया। घबराहट फैल गई लेकिन शांतचित्त लता ने अपने घबराए पिता से कहा, ह्णचिंता मत कीजिए बाबा। मैं, मां और भाई के साथ चारों बहनें नारद की भूमिका निभाऊंगी। मुझे सारे गाने याद हैं, संवाद भी याद है। बेटी के आग्रह को दीनानाथ ने गंभीरता से लिया क्योंकि उसके हावभाव से उन्हें आशा की किरण दिखाई दी। फिर भी एक समस्या थी। अजरुन (दीनानाथ) की भूमिका करने वाला नायक 36 साल का था जबकि नारद सिर्फ सात साल का था। अब फैसला करना था। परदा उठा और छोटा-सा नारद मंच पर आया, अनुभवी कलाकार की जगह एक बच्चे को देखकर दशर्कों के बीच आशंका की लहर दौड़ गई। मास्टर दीनानाथ भी पर्दे पर उत्सुकता से देख रहे थे। हारमोनियम वादक ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ सुर भरे। उसे कैसे पता चलता कि इसी संकेत का तो लता इंतजार कर रही है। छोटे नारद ने अपने होंठ हिलाए और स्वाभाविक रूप से शब्द, सुर और लय पूरी त्कग््रफ२कित्कक के साथ दृश्य की मांग के अनुरूप फूटे। दर्शक अवाक रह गए और जोरदार तालियां बजीं। 42 वर्ष की उम्र में पिता दीनानाथ चल बसे। इसके बाद परिवार विपत्तियों में फंस गया। पिता के साथ काम करने वालों या किसी अन्य ने लता के परिवार की सुध नहीं ली। लता का परिवार 12 से 14 घंटे कड़ी मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से दो समय की रोटी जुटा पाता था। ऐसे विख्यात पिता की याद में उनकी बरसी पर संगीत का कोई कार्यक्रम करना असंभव लग रहा था। आखिरकार, अनुभवहीन मां और 15 बरस की लता ने यह जिम्मेदारी अपने ही कंधों पर उठाने का फैसला किया और स्मृति समारोह कोल्हापुर के पैलेस थियेटर में हुआ। इस समारोह में अनेक जाने-माने संगीतकार आए। लता ने पिता की तस्वीर को पुष्पहार पहनाया, तानपुरा उठाया और तुरंत ही संगीत के उन सुरों में खो गई जो उसने सीख-सृजित किए थे। उस रात घर लौटने के बाद मां ने उसे प्यार से झिड़का, गाते समय तुम्हारे चेहरे पर तनाव था। तुम्हारे बाबा कभी ऐसा नहीं करते थे। दूसरी पुण्यतिथि पर गाते समय लता के चेहरे पर किसी तरह का तनाव नहीं था।

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