मंगलवार, 25 जनवरी 2011

बिहार में चल पड़ा विकास का रथ


अवधेश मिश्रा
बिहार चुनाव 2010 में नीतीश सरकार की बल्ले-बल्ले और लालू के जंगल राज का खात्मा। लगता है कि बिहार के परिदृश्य को बदल देने की यह शुरुआत है। बिहार के मतदाताओं ने लालू यादव के जातीय समीकरण, मायावती की सोशल इंजीनियरिंग और रामविलास पासवान की दोहरे राजनीतिक चंगुल से निकल कर सड़क, सुरक्षा और शिक्षा को प्राथमिकता दी। लगता है गांवों की भोलीभाली जनता भी अब इन राजनीतिज्ञों की नीयत को भलीभांति समझ गयी है। वहां की जनता ने अपनी एक वोट से यह साबित कर दिखाया है कि अब हमें जाति, धर्म की राजनीति नहीं विकास चाहिए। पटना की जनता सड़कों पर उम्मीदों को मन में लिए चुनाव परिणामों को लेकर जश्न मनाना शुरू कर दिया है। बिहार में होने वाले चुनाव आम आदमी की एक गौरवपूर्ण जीवन जीने के साहस और उनकी उम्मीदों का प्रतीक हैं। इस तरह से यह नीतीश कुमार से ज्यादा बिहार की जनता की जीत है जिसने सभी प्रतिकूल परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए जीत दर्ज की। बिहार की जनता ने जाति, अपराध, भ्रष्टाचार की गंदी राजनीति के खिलाफ़ विद्रोह करके नीतीश कुमार के सोशल इंजीनियरिंग में विश्वास किया है। इसमें कोई शक नहीं कि 2010 के बिहार चुनाव वतर्मान राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देने की प्रक्रिया की शुरुआत हैं। इन चुनावों ने जनता की प्राथमिकता में निर्णायक बदलाव लाए हैं।नीतीश ने अगर 2005 के चुनावों में लालू यादव और राबड़ी देवी के जंगल राज को हराया तो वहीं 2010 के चुनावों में जातिधर्म की राजनीति से ऊपर उठकर सड़क, बिजली, पानी और विकास के नाम पर जीत हासिल की। दो तिहाई बहुमत के साथ विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस के अभिमान को चूरचूर कर दिया है। वहीं कांग्रेस जो राहुल गांधी के सहारे बिहार की सत्ता पाने की कोशिश में लगी है, बिहार की जनता ने राहुल को भी नकार दिया है। नीतीश कुमार की छवि एक ऐसे नेता के रूप में उभरकर आई है जिन्होंने राजनीतिक विश्वास को जीता है और बिहार के उस अतीत को फ़िर से वापस लाने की पहल की है, जिसे हर बार बिहार के गौरव से जोड़कर देखा जाता रहा है। नीतीश की जीत में महिलाओं की ऐतिहासिक भागीदारी ने बहुत बड़ी भूमिका निभायी है। जिस राज्य में अभी तक यह माना जाता था कि उनका वोट घर के पुरुषों के निर्देश पर निर्भर है। इसीलिए मतदान में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम होती थी। नीतीश कुमार ने बिहार की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास किया। संभवतया यह एक बड़ा कारक था जिसके चलते मतदाता, खासकर महिलाएं निडर होकर मतदान के लिए पहुंचीं। जहां लड़कियां गुंडागर्दी के डर से स्कूल नहीं जाती थीं, वहीं नीतीश की सरकार में साइकिल से स्कूल जाने लगीं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ बलात्कार की घटनाओं में अभूतपूर्व कमी आयी। इन्हीं बातों से नीतीश के प्रति महिलाओं ने अपना विश्वास जताया और मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। नीतीश की पार्टी को अकेले 100 से ऊपर सीटें मिलने की वजह से उन्हें भाजपा व आरएसएस की हां में हां नहीं मिलाना पड़ेगा। वह निर्भीक होकर अपना निर्णय ले सकेंगे। जो लोग नीतीश को प्रधानमंत्री बनने की बात करते हैं वह समय से पहले की बात के साथ में गलत भी है। क्योंकि बिहार की जनता ने नीतीश को अपना वोट राज्य की दुदर्शा सुधारने के लिए दिया है। जो बिहार की हालत बदतर हो चुकी थी उसे सुधारने के लिए एक अच्छे विकासशील मुख्यमंत्री को अपना वोट दिया है। बिहार अयोध्या जैसे विवादित मुद्दों से दूर निकल चुका है। इस बार जब यह मुद्दा कुछ राज्यों को अपनी तपिश की आग में समेटे था, उस समय भी बिहार की जनता में इसके प्रति कोई दिलचस्पी नहीं देखी गयी। हालांकि हिंदूवादी पाटिर्यों के अगुवा माने जाने वाले नरेंद्र मोदी और बाला साहब ने भी नीतीश की तारीफ करते हुए उन्हें बधाई दी है। बिहार की जनता को अब सिर्फ विकास चाहिए इसीलिए राज्य के लोगों ने नीतीश को यह जनादेश बिहार में सामाजिक क्रांति के उनके अधूरे कामों को पूरा करने के लिए दिया है। एक इंजीनियर के रूप में नीतीश की प्रतिभा राज्य में सामाजिक बदलाव की रूपरेखा तैयार करने में भी साफ झलकती है। दूसरी बार भी विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद नीतीश का दायित्व और अधिक बढ़ गया है। एक इंजीनियर के रूप में नीतीश की प्रतिभा राज्य में सामाजिक बदलाव की रूपरेखा तैयार करने में भी साफ झलकती है। लेकिन फिर भी उन्हें अपनी नीतियां बनाते समय एक ओर जहां मध्यवर्ग और शहरों को ऊपर उठाने का प्रयास करना होगा, वहीं इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि गांव और गरीब इस विकास से अछूते नहीं रह जाएं। नीतीश को ऐसी शानदार सफलता नहीं मिल पाती, यदि गरीब, उपेक्षित तबके और खासकर नक्सल प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों ने उन्हें अपना समर्थन नहीं दिया होता। इसलिए सभी विकास कार्यक्रमों में उन्हें गरीबों और उपेक्षितों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। आए दिन राज्य की भोली-भाली जनता नक्सलियों के चंगुल में फंस जाती है। इसलिए अब उन्हें नक्सलियों को भी बातचीत के लिए आमंत्रित करना होगा। नीतीश यदि अपने किए वायदों पर खरा नहीं उतर पाते हैं तो उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। हालांकि नीतीश से ऐसी उम्मीद नहीं है। क्योंकि पिछले 5 वर्षों में उन्होंने जनता से किए वायदों को पूरा किया है तभी जनता ने उनपर दोबारा भरोसा जताया है । लालू की हार का मतलब है कि यादवों ने भी लालू का साथ छोड़ दिया है। राजद की हार से स्पष्ट हो गया है कि लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में हाशिये पर पहुंच गये हैं। लालू का कहना है कि वे उन रहस्यों का पता लगाएंगे जिसकी वजह से उनकी हार हुई। लेकिन सच तो यह है कि उन्हें आत्मंथन करना चाहिए। गुंडे, माफियाओं को पार्टी से बाहर निकालना चाहिए और संकीर्ण राजनीति की बजाय व्यापक राजनीति करनी चाहिए। अगर राम विलास पासवान की बात करें तो उन्होंने अभी तक सिर्फ सत्तासुख ही भोगा है। जहां सत्ता देखी वहीं चिपक गए। लेकिन अब उनके साथ एक दुर्भाग्य जुड़ गया है। वह जिस पार्टी में जाते हैं वह सत्ता से बिलग हो जाती है। इसलिए अर्से बाद यह पहला मौका है जब पासवान ना तो केंद्र में हैं और ना ही राज्य में। इस चुनाव से एक बात और साबित होती है कि जिस भाजपा के माथे पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगा दिया गया हो वह भी इससे उबरती नजर आ रही है। क्योंकि इस जीत में भाजपा के सुशासन का ही योगदान है। इस जीत का मतलब है कि राममंदिर की राजनीति का खात्मा।

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