मंगलवार, 3 जनवरी 2012

बदला हुआ मंजर

छठ पर्व का समय था मैं अकस्मात ही मिथिला में स्तिथ अपने गाँव श् ब्रहमपुराश् पहुँच गया था, चार दिन चलने वाला यह पर्व पूरे बिहार ए पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में अगाध श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है द्यलगभग १० बरसो से मैंने अपने गाँव का छठ पूजा नहीं देखा था द्य इस पूजा को लेकर पूरे गाँव में उत्साह का वातावरण था द्य उसी दौरान मुझे गाँव के एक भोज में शामिल होने का अवसर भी मिला द्य पार्टियों से थोडा भिन्न होता है द्य गाँव के भोज में छोटे बड़े सभी को पुआल की बीड़ी ; पुआल की छोटी गठरी द्ध पे निचे बैठ कर खाना होता है द्य पानी पिने के लिए सभी अपने घर से ग्लास या लोटा लेकर आते हैं द्य पहले गैस की लाइट जिसे फनिस्वर नाथ रेनू जी ने ष् पञ्च लाइट कहा था ए का इस्तेमाल रौशनी के लिए किया जाता था की व्यवस्था देखि जा सकती है, मैं भी अपने गाँव के भाई ए काका और दादा जी सब के साथ पुआल की बीड़ी पे बैठ गया द्य एक के बाद एक पकवान आते गए द्य एक ही पत्तल पर सारे पकवान को सम्भाल पाना भी अपने आप में एक कला है द्य यहाँ लोग शहरों की तरह चख चख कर नहीं खाते ए गप्पा गप खाते हैं द्य भोजन परोसने वाला सह्रदय आग्रह करता है और कोशिश करता है की खाने वाला शर्म और हिचकिचाहट छोड़ जम कर भोजन का लुफ्त उठाएं द्य खाने के दौरान हंसी मजाक ए टिका टिपणी भी चलते रहते है द्य पूर्व के किसी भोज की भी चर्चा छेड़ दी जाती है और लोग अपने अनुभव बढ़ चढ़ कर बताने लगते हैं द्य इन्ही सब चीजो के बीच लोग अपने खुराक से कुछ जाएदा ही खा लेते हैं द्य मैं भी बातों का आनंद उठाते उठाते अपने नियमित खुराक से जाएदा खा चूका था द्यपर मुझे इस भोज में खाने का जायका उतना उम्दा न लगा जितना उम्दा पहले कभी हुआ करता था द्य पूछने पर पता चला की भोजन बनाने के लिए भाड़े के हलुवाई आयए थे द्यमुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ द्य यह गाँव के तरीके से थोड़ा भिन्न था द्य गाँव में भोज की तैयारी गाँव के लोग ही आपसी मेल मिलाप और समझ बुझ से कर लेते हैं द्य कोई सब्जी बनाने में माहिर तो कोई दाल तो कोई दुसरे पकवान में द्य पकवान बनाने का उनका तरीका भी हट कर होता है द्य मिटटी खोद कर चुल्हा बनाया जाता हैद्य खाना बनाने से पहले चूल्हे का विधिवत पूजा भी किया जाता है द्य उसके बाद लकड़ी की सोंधी आंच पर खाना तैयार होता है द्य खाने का स्वाद और उसकी खुशबू लाजवाब होती है द्य लकड़ी की जगह अब गैस चूल्हे का इस्तेमाल होने लगा है द्य पारंपरिक ढंग से भोजन बनाने वाले लोगो की कमी हो गयी है द्य और कमी हो गयी है पसी प्रेम और मैत्री की द्य लोग छठ में ट्रेनों में ठस्म ठस भर कर गाँव ४.५ दिनों के लिए आते हैं द्य ३ महीने पहले भी ट्रेन में आरक्षण मिलना किसी गोल्ड मेडल से कम नहीं है द्य गाँव के लोग भी इस पर्व का पूरे साल इंतज़ार करते हैं की अपने और पड़ोस के घरों में शहरों से इनके अपने आयेंगे द्य दादी को पोता पोती के लिए पकवान बनाने का मौका मिलता है द्य दादा जी उन्हें कंधे पर बैठा पूरे गाँव में घुमाते हैं और अपने खेत खलियान दिखाते हैं द्य सारी करवाहट और शिकायत को किनारे कर वो इस ४.५ दिन एक अलग दुनिया में खो जाते हैं द्य शहर से आयए लोग नए कपड़े पहनते हैंए नए चमकदार मोबाइल और कैमरे दिखाते गाँव में घूमते हैं द्य गाँव के लोग उन्हें कोतुहल भरी नज़रों से देखते हैं और आह भरते हैं की वो कब शहर जायेंगे द्य शहरों के तरफ पलायन का आलम ये है की २०.४० साल की उम्र का शायद ही कोई नवयुवक आज गाँव में रुका हो , जिसे जहाँ मौका मिला वो उधर ही निकल गयाद्य रह गए हैं तो बूढ़े ए औरतें और बच्चें जिनके पिता की आमदनी बहुत जाएदा नहीं है द्य पलायन वैसे तो हर वर्ग में है पर ऊँची जाती ए हिन्दू हो या मुसलमान ए में सबसे जाएदा है परिस्थितियाँ कुछ बदली जरुर हैं द्य गाँव में अब ६.७ घंटे जली रहती है द्य फुश की झोपरियों की जगह पक्के के मकान खड़े हो गए हैं द्य सुबह सुबह बच्चे पोशाक पेहेन कर स्कूल जाते दिख जाते हैं द्य मजबूत सड़को पर गाड़ियाँ सायें सायें करते निकल जाती हैं द्य फिर भी गाँव अपने मजबूत कंधो वाले बेटों की राह देख रही है ने अपने नह्ने नह्ने कदमो से गाँव की धुल भरी गलियों में दौड़ लगायी थी द्य जिन्होंने गाँव के तालाबों और पोखरों के घाट पर बने चबूतरों से पानी में लम्बी छलांग लगायी थी द्य वो गाँव का मंदिर उनकी राह देख रहा है जिनकी घंटी बजाने के लिए वह अपने दादा जी के कंधे पर चढ़ जाया करते थे द्यआज भले ही उस मंदिर की दीवार थोड़ी ढेह गयी है द्य जिन आम के पेड़ो पे उन्होंने गुलेल चलाई थी वो पेड़ आज भी इस गाँव में हैं द्यहाँ थोडा बुड्ढा हो चला है पर नए पत्तो और नए फलों के साथ आज भी वो उनका इंतज़ार कर रहा है
- कुणाल

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