शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

खूबसुरत बनाना है बिहार को : डा राजीव सिन्हा

उनका सपना खुबसूरत बिहार बनाने का है। इसके लिये वे हरसंभव प्रयास भी कर रहे हैं। बिना यह आकलन किये कि उनके प्रयास का फ़ल क्या होगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है। हम जिनकी बात कर रहे हैं उनका नाम डा राजीव सिन्हा है। ये मूल रुप से बिहार के हैं और वर्तमान में आस्ट्रेलियाई शहर ब्रिसबेन के ग्रीफ़िथ युनिवर्सिटी में कृषि विज्ञान के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं। जैविक खेती को लेकर इनकी ख्याति पूरी दुनिया में है। इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि इनके अनुरोध पर एग्रो केमिकल कंपनियों के दबाव के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने देश में वर्मी कम्पोस्ट के औद्योगिक उत्पादन को हरी झंडी दी। डा सिन्हा की विशेषज्ञता का उपयोग आस्ट्रेलियाई सरकार ने भी जनहित में किया है। विशेषकर इनके द्वारा इजाद की गई अर्थवर्म तकनीक पर आधारित सीवरेज प्लांट का उपयोग अब चिली और मैकिस्को आदि देशों में भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। भारत में गुजरात के भावनगर शहर में सरकार ने डा सिन्हा के अनुभवों का भरपूर उपयोग करते हुए वाटर मैनेजमेंट एंड प्यूरीफ़िकेशन सिस्टम को सजीव किया है। डा सिन्हा वर्तमान में पटना में छुट्टियां मनाने आये हैं। इस दौरान इन्होंने “अपना बिहार” के साथ विशेष बातचीत की। डा सिन्हा ने बताया कि आज पूरे विश्व में जैविक खेती ही एक मात्र विकल्प रह गया है। खेती में खतरनाक रसायनों के उपयोग का हश्र पूरी दुनिया देख चुकी है। अभी हाल ही में अमेरिकी सरकार द्वारा कराये गये सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि केवल रसायनिक ऊर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के कारण अमेरिका में करीब 20 हजार लोग हर साल बेमौत मर जाते हैं। यही स्थिति पूरे विश्व की है। डा सिन्हा बताते हैं कि केंचुआ असल में मानव जीवन के लिये वरदान है। अब तो विश्व के कई हिस्सों में यह समेकित खेती के लिये सबसे अधिक उपयोगी साबित हो रहा है। मसलन अस्ट्रेलिया में लोग वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने से लेकर गायों के चारे के रुप में भी केंचुआ का इस्तेमाल करते हैं। डा सिन्हा बताते हैं कि केंचुआ के शरीर में एंटी आक्सीडेंट तत्वों की प्रचुरता के अलावे पौष्टिकता के सारे तत्व मौजूद हैं और इनके खाने से गायें अधिक दूध एवं अधिक पौष्टिक दूध देती हैं। भारत में धर्म संबंधी मान्यताओं के वजह से यह संभव नहीं है तब भी पाल्ट्री के क्षेत्र में केंचुओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। डा सिन्हा ने बताया कि केंचुआ केवल वर्मी कम्पोस्ट ही नहीं बनाता है, बल्कि इसका उपयोग पानी के शोधन के लिये भी किया जा सकता है। बिहार में यदि इस तकनीक पर जल शोधन इकाइयों की स्थापना हो तो निश्चित तौर पर गंगा के प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में सफ़लता मिलेगी। इसका एक लाभ यह भी होगा कि बड़े पैमाने पर किसानों को जैविक खाद की आपूर्ति की जा सकेगी। बहरहाल, डा सिन्हा चाहते हैं पूरी दुनिया में प्रशंसित उनका यह तकनीक बिहार में भी अमल में लाया जाये, ताकि बिहार में सही मायनों में हरित क्रांति हो सके। लेकिन इन्हें अफ़सोस है कि इनके द्वारा इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और कृषि मंत्री को भेजे गये अनेकों ईमेल का आजतक कोई जवाब नहीं मिल सका है। डा सिन्हा चाहते हैं कि यदि बिहार सरकार उनके इस तकनीक को देखना चाहती है तो उसे अपने विशेषज्ञों को दुनिया के उन हिस्सों में भेजना चाहिये जहां लोग उनकी इस तकनीक का लाभ उठा रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ब्लॉग प्रस्तुति