शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

नेता जी सुभाष चंद्र बोस की ऐसी दुर्गति देखी नहीं होगी आपने!

ब्रज किशोर दुबे
देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए भारत के नौजवानों को आजादी की लड़ाई में कुदने को प्रेरित करने के लिए तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे अजादी दूंगा का नारा देने वाले नेताजी को आजादी के महज 64 साल ही बीतने पर हमलोगों ने उन्हें भूला दिया।
याद में महज खानापूर्ति
जन्म तिथि 23 जनवरी को या पूर्णतिथि 18 अगस्त को याद कर महज खानापूर्ति कर देते है। नहीं तो यह दृश्य देखने को नहीं मिलती। आरा के रमना मैदान के पूर्वी कोने व महिला कॉलेज रोड़ पर स्थित उनकी प्रतीमा का हाल देख कर आँखे शर्म से झुक जाती है। ऐसा नहीं कि यह दृश्य अकेले मुझे देखने को मिली। इस रोड़ से शहर के तमाम सरकारी बाबूओं से लेकर समाज के बुद्धिजिवि नागरीकों का आना-जाना लगा रहता है। शहर के महत्वपूर्ण होटल इसी रोड़ पर स्थित है, महज 100 मीटर की दूरी पर सिविल कोर्ट और 10 मीटर दूरी पर शहर का सबसे महत्वपूर्ण सभागार नागरी प्रचारणी है, तो 5 मीटर की दूरी पर भीमार्ट मौल है।
नेताजी की वीरगाथा
23 मार्च 1897 को उडिसा के कटक में जन्म लेने वाले सुभाष चंन्द्रबोस विचारों से प्रभावित होकर जर्मनी के शासक हिटलर ने नेताजी कह कर संबोधित किया। यही नहीं राष्ट्रपिता महात्मागांधी के बुलाने पर कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने वाले राष्ट्रभक्त नेजाजी ने 1938 और 1939 में कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किये गये। लेकिन नेताजी ने माना कि अंग्रेजों से भारत को अजाद कराने के लिए अहिंसा का रास्ता छोडऩा होगा। इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए 17 जनवरी 1941 नेताजी जपान की यात्रा पर चले गये। 21अक्टूबर 1943 ई. को उन्होंने ने जपान सरकार के सहयोग से सिंगापुर में अजाद हिन्द फौज सरकार का गठन किया। जो भारत के पूर्वी भागों पर हमला कर भारत की जमी को अंग्रेजो से मुक्त कराया। इसी दौरान माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 वायुयान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। तब से लेकर आज तक उनकी मृत्यु कब और कहाँ हुई यह जांच का विषय ही रह गया है।

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